असम की महिलाओं का पारंपरिक परिधान मेखेला चादर दो हिस्सों से मिलकर बना होता है। मेखेला निचला परिधान और चादर ऊपरी हिस्से पर लपेटा जाने वाला कपड़ा है। इसे मोगा, एरी और पाट सिल्क जैसे कपड़ों से बुना जाता है।मेघालय की खासी महिलाओं का पारंपरिक परिधान जैनसेम अपनी खास ड्रेपिंग के लिए जाना जाता है। यह दो अनस्टिच्ड कपड़ों से तैयार होता है, जिन्हें कंधे पर बांधा जाता है। इसके साथ टाप-मोह ख्लीह जैसे शॉल का इस्तेमाल भी किया जाता है। मेघालय की गारो महिलाओं का पारंपरिक परिधान डाकमांडा है। यह हाथ से बुने कपड़े से तैयार किया जाता है और इसके किनारों पर बने आकर्षक बॉर्डर इसकी खूबसूरती बढ़ाते हैं। गारो समुदाय की पारंपरिक बुनाई और डिजाइन इसमें साफ नजर आते हैं। त्रिपुरा की पारंपरिक पोशाक में रिगनाई और रिसा का खास स्थान है। रिगनाई शरीर के निचले हिस्से पर पहना जाने वाला परिधान है, जबकि रिसा ऊपरी हिस्से के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इनके रंग-बिरंगे पैटर्न त्रिपुरा को दर्शाते हैं। अरुणाचल प्रदेश में अलग-अलग जनजातियों की अपनी विशिष्ट बुनाई परंपराएं हैं। अपातानी समुदाय के वस्त्रों और एक्सेसरीज में ज्यामितीय और रंगीन पैटर्न देखने को मिलते हैं। यहां की पारंपरिक बुनाई कपड़ों के साथ स्कार्फ और बैग बनाई जाती हैं। पूर्वोत्तर भारत के पारंपरिक परिधान वहां की संस्कृति, समुदाय और पीढ़ियों से चली आ रही बुनाई कला को जीवित रखते हैं। यही विविधता इन्हें भारतीय फैशन विरासत का बेहद खास हिस्सा बनाती है।