कॉफी बीन्स फोटो सोर्स- नवभारत डिजाइन
आपके कप की कॉफी का सफर कॉफी के पौधे पर लगने वाले फल से शुरू होता है। इस फल को कॉफी चेरी कहा जाता है और इसके अंदर मौजूद बीज आगे चलकर कॉफी बीन्स बनते हैं।जब कॉफी चेरी पक जाती हैं, तो उन्हें पौधे से तोड़ा जाता है। अच्छी गुणवत्ता वाली कॉफी के लिए पकने की अवस्था और तुड़ाई का तरीका महत्वपूर्ण होता है।तुड़ाई के बाद कॉफी चेरी का बाहरी हिस्सा हटाया जाता है। इसके लिए अलग-अलग प्रसंस्करण विधियां इस्तेमाल होती हैं, जैसे प्राकृतिक और धुली हुई प्रक्रिया। इन तरीकों का असर कॉफी के स्वाद पर भी पड़ सकता है।धुली हुई प्रक्रिया में फल की परत हटाने के बाद बीजों को किण्वन और पानी से सफाई की प्रक्रिया से गुजारा जा सकता है। इससे बीजों पर बची चिपचिपी परत हटाने में मदद मिलती है।प्रसंस्करण के बाद कॉफी बीन्स को सुखाया जाता है। सुखाने का उद्देश्य उनमें मौजूद अतिरिक्त नमी कम करना है, ताकि बीन्स को सुरक्षित तरीके से आगे रखा और इस्तेमाल किया जा सके।सुखाने और आगे की मिलिंग के बाद कॉफी के बीज अपने सामान्य हरे रंग में दिखाई देते हैं। इन्हें आम तौर पर ग्रीन कॉफी कहा जाता है और इन्हें भूनने से पहले व्यापार और परिवहन के लिए तैयार किया जाता है।ग्रीन कॉफी बीन्स को नियंत्रित तापमान पर भुना जाता है। रोस्टिंग के दौरान बीन्स के स्वाद और सुगंध को विकसित किया जाता है। हल्की, मध्यम और गहरी रोस्टिंग से कॉफी का स्वाद अलग हो सकता है।रोस्टिंग के बाद बीन्स को जरूरत के अनुसार पीसा जाता है। पीसने की बारीकी कॉफी बनाने की विधि के अनुसार बदली जा सकती है। सही पीस और पानी के साथ कॉफी से स्वाद और सुगंध बेहतर तरीके से निकाली जा सकती है।अब पिसी हुई कॉफी को पानी के साथ तैयार किया जाता है। फिल्टर कॉफी, फ्रेंच प्रेस और एस्प्रेसो जैसी अलग-अलग विधियों में पानी और कॉफी का संपर्क अलग तरीके से होता है। पानी की गुणवत्ता भी अंतिम स्वाद को प्रभावित कर सकती है।आखिर में कई चरणों से गुजरकर कॉफी आपके कप तक पहुंचती है। यानी एक कप कॉफी के पीछे खेती से लेकर प्रसंस्करण, सुखाने, रोस्टिंग, पीसने और ब्रू करने तक की लंबी प्रक्रिया होती है।