शव कंधे पर उठाकर नदी के प्रवाह को पार कर रहे लोग फोटो सोर्स- नवभारत
यवतमाल

यवतमाल के 431 गांवों में श्मशान शेड की जरूरत, 271 पहले से बने शेड भी जर्जर, अंतिम संस्कार में जोखिम

Yavatmal News: यवतमाल जिले के 431 गांवों में श्मशानभूमि शेड की जरूरत है। 232 गांवों में जगह नहीं, 199 में निर्माण बाकी है। 271 पुराने शेड नादुरुस्त हैं, जबकि मालगांव में शव नदी पार कर ले जाना पड़ा।

प्रमोद यादव

Yavatmal Zilla Parishad Cremation Shed: यवतमाल जिले में ग्रामीण क्षेत्रों की श्मशानभूमियों की स्थिति को लेकर जिला परिषद की ओर से तैयार किए गए रिपोर्ट में कई गंभीर तथ्य सामने आए हैं। 20 अगस्त तक को तहसील निहाय जानकारी के अनुसार जिले में कुल 431 गांव ऐसे हैं, जहां श्मशानभूमि शेड की आवश्यकता है।

इनमें 232 गांवों में श्मशानभूमि के लिए जगह उपलब्ध नहीं है, जबकि 199 गांवों में जगह होने के बावजूद शेड का निर्माण नहीं हुआ है। जिले के विभिन्न तहसील में पहले से निर्मित श्मशानभूमि शेडों की स्थिति भी चिंताजनक है।

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार

यवतमाल जिले में ग्रामीण क्षेत्रों में 271 शेड नादुरुस्त स्थिति में हैं। इसके कारण ग्रामीण क्षेत्रों में अंतिम संस्कार के दौरान नागरिकों को अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। बारिश के मौसम में यह समस्या और गंभीर हो जाती है। तहसील निहाय स्थिति पर नजर डालें तो झरी तहसील में सर्वाधिक 67 गांवों में श्मशानभूमि शेड की आवश्यकता है।

इसके बाद केलापुर में 40, उमरखेड में 36, घाटंजी में 35, महागांव में 34 तथा वणी में 32 गांवों में शेड की आवश्यकता दर्ज की गई है। वहीं, श्मशानभूमि के लिए जगह उपलब्ध नहीं होने वाले गांवों की संख्या भी कई तहसील में अधिक है। झरी में 38, केलापुर में 32, वणी में 25, महागांव में 24 और उमरखेड में 19 गांवों में जगह की कमी बताई गई है।

अर्थी लेकर नदी पार करने मजबूर मालगांववासी

महागांव तहसील के मालगाव के नागरिकों की समस्याएं दिन-ब-दिन गंभीर होती जा रही है। विडंबना यह है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद भी अंतिम संस्कार के लिए शव को श्मशानभूमि तक ले जाने का सुरक्षित रास्ता उपलब्ध नहीं है। हाल ही में परिजनों को शव कंधे पर उठाकर जान जोखिम में डालते हुए नदी के प्रवाह को पार करना पड़ा।

यवतमाल जिले के मालवागत गांव में श्मशानभूमि के लिए शासन की ओर से ग्राम पंचायत प्रशासन को भूमि उपलब्ध कराई गई है तथा इसके लिए निधि की भी व्यवस्था की गई है। इसके चावजूद श्मशानभूमि तक पहुंचने के लिए आवश्यक सड़क आखिर कहां गायब हो गई, ऐसा सवाल अब ग्रामीण उठा रहे है।

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