Thane Collector Office: कहा जाता है कि अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता की पहली चिंगारी सन 1857 में शहीद मंगल पांडेय ने जलाई थी। लेकिन इतिहास में यह भी दर्ज है,कि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शहीद मंगल पांडेय के पहले भी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष करने वाले कुछ क्रांतिवीर हुए। उनमें महाराष्ट्र से क्रांतिकारी राजे उमाजी नाईक का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।
राजे उमाजी नाईक का जन्म 7 सितंबर 1791 को पुणे जिले के पुरंदर क्षेत्र के भिवडी गांव में रामोशी समुदाय में हुआ था। वे ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के खिलाफ शुरुआती सशस्त्र विद्रोह के प्रमुख नेताओं में माने जाते हैं। रामोशी समुदाय पारंपरिक रूप से मराठा शासन में किलों की सुरक्षा और गश्त जैसे कार्यों से जुड़ा था। ब्रिटिश सत्ता स्थापित होने के बाद इन पारंपरिक अधिकारों और रोजगार के साधनों पर असर पड़ा, जिसके बाद उमाजी नाईक ने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करते हुए उनके छक्के छुड़ा दिए।
उमाजी नाईक ने अपने साथियों के साथ गुरिल्ला पद्धति से ब्रिटिश शासन का मुकाबला किया। 1820 के दशक में उनका विद्रोह पुणे और आसपास के क्षेत्रों में काफी प्रभावी रहा। ब्रिटिश सरकार ने उनकी गिरफ्तारी के लिए उस समय हजारों का इनाम घोषित किया था। अंततः उन्हें दिसंबर 1831 में गिरफ्तार किया गया। ब्रिटिश शासन ने 3 फरवरी 1832 को पुणे में उन्हें फांसी दे दी।
राजे उमाजी नाईक की जयंती पर सोमवार को ठाणे जिलाधिकारी कार्यालय के सभागार में उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की गई। निवासी उपजिलाधिकारी डॉ. संदीप माने और तहसीलदार सचिन चौधर ने राजे उमाजी नाईक के चित्र पर पुष्पहार अर्पित कर अभिवादन किया। इस अवसर पर जिलाधिकारी कार्यालय के अधिकारी और कर्मचारी उपस्थित रहे।
उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र सरकार ने भी उनके नाम पर रामोशी समाज के सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए राजे उमाजी नाईक आर्थिक विकास महामंडल की स्थापना की है। ठाणे जिलाधिकारी कार्यालय में हुए कार्यक्रम के जरिए उनके साहस, संघर्ष और ब्रिटिश शासन के खिलाफ प्रतिरोध की विरासत को स्मरण किया गया।