Thane Adani Bhorande Pumped Storage Hydro Project: ठाणे और पुणे जिलों में बिजली की मांग को पूरा करने को लेकर ठाणे जिले के मालशेज घाट में अडानी कंपनी की प्रस्तावित 1500 मेगावाट के 'भोरांडे उदंचन जलविद्युत प्रोजेक्ट' विवादों में फंस गया है। सामाजिक, आर्थिक एवं पर्यावरणीय नुकसान सहित अन्य कारणों की वजह से स्थानीय ग्रामीणों और आदिवासियों का भारी विरोध देखने को मिल रहा है।
जिसकी वजह से महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने पिछले दिनों जन सुनवाई को टाल दी थी। गौरतलब हो कि अडानी रिन्यूएबल एनर्जी की तरफ से 1,500 मेगावाट क्षमता का यह हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट प्रस्तावित है, जिस पर लगभग 7,048 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है।
यह प्रोजेक्ट पुणे जिले के जुन्नर तालुका और ठाणे जिले के मुरबाड तालुका के बीच फैला हुआ है, जिससे करीब 79 गांवों के प्रभावित होने की आशंका है। इसमें पानी को दो जलाशयों के बीच ऊपर-नीचे घुमाकर बिजली बनाई जाएगी, जिसके लिए शुरुआती तौर पर कालू नदी के पानी का उपयोग किया जाना है। पर्यावरण प्रेमियों का मानना है कि पश्चिमी घाट (सह्याद्री) के संवदेनशील जंगलों और पहाड़ियों में इस तरह के निर्माण से प्राकृतिक संतुलन बिगड़ जाएगा।
जबकि किसानों का कहना है कि गर्मियों में पानी का स्तर घटने से स्थानीय स्तर पर पीने और सिंचाई के पानी की भारी किल्लत हो सकती है। इसी तरह ग्रामीणों और आदिवासियों का आरोप है कि उन्हें इस बड़े प्रोजेक्ट की जानकारी लंबे समय तक अंधेरे में रखकर दी गई और उनसे कोई सहमति नहीं ली गई।
पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट स्थानीय भाषा में पूरी तरह उपलब्ध न होने और पेसा कानून के नियमों का पालन न करने का भी आरोप लगाया गया है। प्रोजेक्ट के विरोध में स्थानीय नागरिकों और किसान संगठनों ने सड़क जाम और प्रतीकात्मक 'गधा मोर्चा' जैसे आक्रामक आंदोलन किए है। बताया गया कि यह प्रोजेक्ट मुख्य रूप से 'ऑफ-स्ट्रीम क्लोज्ड लूप' की एडवांस्ड टेक्नोलॉजी पर आधारित है। इस पूरे प्रोसेस के लिए, शुरुआती फेज में कालू नदी और डैम से लगभग 9।88 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी लिफ्ट करने का प्लान है।
इस प्रोजेक्ट के टेक्निकल डिजाइन के अनुसार, पुणे जिले के जुन्नर तालुका के आडोशी के उपरी हिस्से में और ठाणे जिले के मुरबाड तालुका के भोरंडे के निचले हिस्से में दो नए और बड़े जलाशय (डैम) बनाए जाएंगे। पानी लिफ्ट होने के बाद, इसे इन दोनों जलाशयों के बीच लगातार ऊपर-नीचे पंप करके टर्बाइन के जरिए 1500 मेगावॅट कैपेसिटी की बिजली बनाई जाएगी। गर्मियों में इवैपोरेशन से होने वाली कमी को कालू नदी से ही पूरा किया जाएगा। हालांकि, सवाल यह है कि गर्मियों में फ्लो कम होने के बाद यह पानी कैसे मिलेगा। इस पर अभी कुछ साफ नहीं है, लेकिन उम्मीद जताई जा रही है कि इसके लिए कालू नदी में एक डैम बनाया जाएगा, इससे नदी पर डिपेंडेंट हजारों परिवार प्रभावित होंगे।
अडानी के इस बड़े प्रोजेक्ट का स्थानीय गांववाले, ग्राम पंचायत और पर्यावरणविद कड़ा विरोध कर रहे हैं। इसके पीछे कई सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय कारण हैं। सबसे बड़ी वजह स्थानीय लोगों में विस्थापन और ज़मीन खोने का डर है। इस प्रोजेक्ट के लिए कुल 166.06 हेक्टेयर जमीन की जरूरत है, जिसमें से स्थानीय लोगों की 105.18 हेक्टेयर निजी खेती की जमीन और 60.87 हेक्टेयर जंगल की जमीन पर असर पड़ेगा।
इससे पुणे और ठाणे जिलों के 79 गांवों के लोगों के समक्ष रोजी-रोटी का सवाल खड़ा हो गया है। इसके अलावा, यह प्रोजेक्ट क्षेत्र की समृद्ध जैवविविधता के लिए बहुत बड़ा खतरा बन सकता है। स्थानीय जमीन मालिकों, पर्यावरणविदों और सामाजिक संगठनों ने इस परियोजना के खिलाफ़ लोकतांत्रिक तरीकों से प्रशासन पर बहुत दबाव डालना शुरू कर दिया है।
उनकी पहली और सबसे बड़ी मांग एक पारदर्शी जन सुनवाई की थी। स्थानीय नागरिकों ने जिलाधिकारी को एक विस्तृत ज्ञापन देकर सीधे तौर पर प्रोजेक्ट के बारे में कम टेक्निकल जानकारी और स्थानीय मातृभाषा में रिपोर्ट उपलब्ध न होने के कारण ठाणे जिले में प्रस्तावित जन सुनवाई को टालने की मांग की थी। साथ ही, पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड ने शुरू में सुनवाई के लिए धसई में जगह तय की थी, जो प्रभावित गांवों से 15 से 40 किलोमीटर दूर था।