Satara Zilla Parishad Election: महाराष्ट्र के सतारा जिला परिषद अध्यक्ष चुनाव को लेकर छिड़ी सियासी जंग अब कानूनी और प्रशासनिक गलियारों में भी चर्चा का विषय बन गई है। एक तरफ महायुति सरकार के भीतर शिवसेना (एकनाथ शिंदे) और बीजेपी के बीच दरार साफ दिखने लगी है, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय पुलिस को कोर्ट की कड़ी फटकार का सामना करना पड़ा है।
अदालत ने गिरफ्तार किए गए राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के दो नेताओं को न केवल रिहा करने का आदेश दिया, बल्कि पुलिस की कार्यशैली को 'बर्बरता' करार दिया।
सतारा न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC) एस. इवारे ने एनसीपी नेताओं अनिल शिवाजीराव देसाई और संदीप मांडवे को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया। अदालत ने पाया कि पुलिस ने गिरफ्तारी की उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया और हिरासत में आरोपियों के साथ दुर्व्यवहार किया। मेडिकल रिपोर्ट में भी चोटों की पुष्टि हुई, जिसके आधार पर कोर्ट ने पुलिस को कारण बताओ नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगा है।
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अदालत ने सख्त लहजे में कहा, "दुर्व्यवहार के संकेतों और मेडिकल साक्ष्यों को देखते हुए आगे पुलिस हिरासत देना उचित नहीं है। किसी भी नागरिक के मौलिक अधिकारों की बलि देकर पूछताछ की अनुमति नहीं दी जा सकती।"
पुलिस के 'किडनैपिंग' वाले दावे को तब बड़ा झटका लगा जब कथित पीड़ित जिला परिषद सदस्य ने खुद अदालत में पुलिस के आरोपों का खंडन कर दिया। पीड़ित ने स्पष्ट किया कि उसका कोई अपहरण नहीं हुआ था। इसके बाद मजिस्ट्रेट ने दोनों एनसीपी नेताओं को 50,000 रुपये के निजी मुचलके पर रिहा करने का आदेश सुनाया। गौरतलब है कि पुलिस ने जांच के दौरान गिरफ्तारी प्रपत्र (Arrest Forms) पेश करने में भी कोताही बरती थी, जिस पर कोर्ट ने नाराजगी जताई।
सतारा जिला परिषद अध्यक्ष चुनाव को लेकर छिड़ी सियासी जंग की इस राजनीति ने महायुति सरकार के भीतर के अंतर्विरोधों को उजागर कर दिया है। राज्य के आबकारी मंत्री और शिवसेना नेता शंभूराज देसाई ने सीधे तौर पर बीजेपी पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि पुलिस का इस्तेमाल राजनीतिक दबाव बनाने के लिए किया जा रहा है। शंभूराज देसाई और एनसीपी (अजित पवार) के मंत्री मकरंद पाटिल ने दावा किया कि चुनाव के दौरान स्थानीय पुलिस ने उनके और उनके समर्थकों के साथ बदसलूकी की।