नागपुर में दिसंबर 1947 में सेंट्रल प्रोविंसेस के गार्ड ऑफ ऑनर का निरीक्षण करते सरदार वल्लभभाई पटेल सोर्स: सोशल मीडिया
महाराष्ट्र

सरदार पटेल न होते तो महाराष्ट्र का नक्शा अधूरा होता, निजाम का गुरूर तोड़ भारत में कैसे मिला मराठवाड़ा

Sardar Patel Birth Anniversary Special: सरदार पटेल की जयंती पर जानिए कैसे ऑपरेशन पोलो के जरिए निजाम और रजाकारों के खौफनाक तांडव को खत्म कर मराठवाड़ा को भारत में शामिल किया गया।

आकाश मसने

Highlights

  • 15 अगस्त 1947 के बाद भी गुलाम था मराठवाड़ा।

  • सरदार वल्लभभाई पटेल ने हैदराबाद के निजाम से मराठवाड़ा को दिलाई आजादी।

  • ऑपरेशन पोलो के तहत 5 दिनों में निजाम की सेना का सरेंडर।

  • 17 सितंबर को मराठवाड़ा को मिली दूसरी आजादी।

Sardar Vallabhbhai Patel Operation Polo Marathwada Story: 15 अगस्त 1947 को जब पूरा भारत लाल किले से फहराते तिरंगे और आजादी के नए सबेरे का जश्न मना रहा था, तब महाराष्ट्र का एक अहम हिस्सा मराठवाड़ा खौफ, जुल्म और अंधेरे के साए में सिसक रहा था। देश आजाद हो चुका था, लेकिन महाराष्ट्र के आज के छत्रपति संभाजीनगर, नांदेड़, लातूर, जालना, बीड, परभणी, धाराशिव और हिंगोली तब हैदराबाद रियासत के क्रूर निजाम उस्मान अली खान के पंजे में जकड़े हुए थे। इस ऐतिहासिक अन्याय को खत्म कर मराठवाड़ा को भारत संघ में मिलाने का पूरा श्रेय देश के पहले गृहमंत्री 'लौह पुरुष' सरदार वल्लभभाई पटेल के दृढ़ संकल्प को जाता है।

आज 31 अक्टूबर को सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती के अवसर पर, आइए पलटते हैं इतिहास के उन पन्नों को जब पटेल की प्रशासनिक दृढ़ता ने महाराष्ट्र का भूगोल और इतिहास हमेशा के लिए बदल दिया।

आजादी के समय पूरा भारत लगभग 562 छोटी-बड़ी रियासतों में बंटा हुआ था, जो ब्रिटिश शासन से मुक्त होने के बाद पूरी तरह स्वतंत्र थीं। इन्हें भारत या पाकिस्तान में शामिल होने या स्वतंत्र रहने की छूट थी, जिससे देश के सैकड़ों टुकड़ों में बंटने का खतरा था। ऐसे में इन रियासतों को भारत संघ में मिलाने का कठिन कार्य सरदार पटेल ने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति, दूरदृष्टि और कूटनीतिक कौशल से पूरा किया।

हैदराबाद के निजाम का अड़ियल रुख

भारत की आजादी के वक्त हैदराबाद के निजाम ने ऐलान कर दिया था कि वह न तो भारत में शामिल होगा और न ही पाकिस्तान में, बल्कि वह एक स्वतंत्र देश रहेगा। लेकिन यह सिर्फ एक राजनीतिक चाल थी, अंदर ही अंदर निजाम पाकिस्तान के संपर्क में था और वहां से आधुनिक हथियार मंगवा रहा था। निजाम के इस फैसले का सबसे बुरा असर मराठवाड़ा की जनता पर पड़ा, जो सदियों से मराठी संस्कृति और पहचान के साथ जी रही थी और भारत संघ का हिस्सा बनना चाहती थी।

जनता की इस आवाज को दबाने के लिए हैदराबाद के निजाम के इशारे पर कासिम रिजवी ने रजाकार नाम की एक क्रूर निजी सेना का गठन किया। इन रजाकारों ने मराठवाड़ा के गांवों में जो तांडव मचाया, वह रूह कंपा देने वाला है। तिरंगा फहराने पर पाबंदी थी, राष्ट्रगीत गाने पर सीधे मौत की सजा दी जाती थी। महिलाओं का उत्पीड़न, किसानों की जमीनों पर जबरन कब्जा और देशभक्तों की सरेआम हत्याएं की जा रही थी।

हालांकि, स्वामी रामानंद तीर्थ, गोविंदभाई श्रॉफ, बाबासाहेब परांजपे और अनंत भालेराव जैसे नायकों के नेतृत्व में मराठवाड़ा की जनता ने 'सशस्त्र मुक्ति संग्राम' छेड़ रखा था। लेकिन निजाम की भारी-भरकम आधुनिक सेना और क्रूर रजाकारों के सामने इन स्वतंत्रता सेनानियों को एक निर्णायक सरकारी और सैन्य बल की सख्त दरकार थी।

सरदार वल्लभभाई पटेल

जब सरदार पटेल ने कहा- हैदराबाद भारत के पेट का कैंसर है

दिल्ली में बैठे भारत के तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल इस पूरी स्थिति को बहुत बारीकी से देख रहे थे। वे अच्छी तरह जानते थे कि यदि हैदराबाद एक स्वतंत्र देश बन गया, तो भारत की एकता और संप्रभुता हमेशा के लिए खतरे में पड़ जाएगी। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शांतिपूर्ण और कूटनीतिक तरीके से सुलझाना चाहते थे, लेकिन सरदार पटेल का मानना था कि बातचीत का समय अब निकल चुका है।

सरदार पटेल ने एक आंतरिक बैठक में बेहद कड़े शब्दों में कहा था, "हैदराबाद भारत के पेट में एक ऐसा कैंसर है, जिसका इलाज बिना समय गंवाए केवल सर्जरी से ही संभव है।" जब रजाकारों के अत्याचार महाराष्ट्र की सीमाओं को पार कर सोलापुर और मध्य प्रांत के गांवों तक पहुंचने लगे, तब सरदार पटेल ने कैबिनेट की झिझक के बावजूद स्वतंत्र भारत का सबसे बड़ा सैन्य फैसला लेने का मन बना लिया।

ऑपरेशन पोलो: सिर्फ 108 घंटे में हैदाराबाद के निजाम का गुरूर खाक

13 सितंबर 1948 की सुबह भारत के गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल के एक आदेश पर भारतीय सेना ने हैदराबाद रियासत के खिलाफ चौतरफा सैन्य कार्रवाई शुरू कर दी। इस गुप्त सैन्य अभियान को नाम दिया गया ऑपरेशन पोलो। इस सैन्य अभियान का नाम 'ऑपरेशन पोलो' इसलिए रखा गया था क्योंकि उस समय अकेले हैदराबाद शहर में 17 पोलो ग्राउंड हुआ करते थे।

भारतीय सेना के जांबाज टैंकों और बख्तरबंद गाड़ियों के साथ रियासत में दाखिल हुए। महाराष्ट्र की सोलापुर सीमा से भारतीय सेना की टुकड़ियों ने जैसे ही मराठवाड़ा की धरती पर कदम रखा, स्थानीय जनता की आंखों में खुशी के आंसू आ गए। लोगों ने सेना का स्वागत फूल-मालाओं से किया और रजाकारों के ठिकानों की सटीक जानकारी दी।

हैदराबाद रियासत निज़ाम मीर उस्मान अली खान तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल के समक्ष आत्मसमर्पण करते हुए

17 सितंबर 1948 को रजाकारों ने किया आत्मसमर्पण

भारतीय सेना का पराक्रम ऐसा था कि निजाम की सेना और रजाकारों के पैर उखड़ गए। मात्र 5 दिनों में यानी कुल 108 घंटों के सैन्य एक्शन के बाद, 17 सितंबर 1948 की शाम को निजाम की सेना के जनरल अल इदरूस ने आत्मसमर्पण कर दिया। निजाम उस्मान अली खान ने रेडियो पर आकर अपनी हार स्वीकार की और भारत संघ में शामिल होने के दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दिए।

अंतिम क्षणों तक महाराष्ट्र की चिंता और एक ऐतिहासिक किस्सा

इतिहासकारों के अनुसार, जब दिल्ली में ऑपरेशन पोलो की अंतिम रणनीति तैयार हो रही थी, तब सरदार पटेल का स्वास्थ्य बेहद खराब था। डॉक्टरों ने उन्हें पूरी तरह आराम करने की सलाह दी थी। लेकिन देश की अखंडता का यह सवाल उनके जीवन का सबसे बड़ा मिशन था। जैसे ही 17 सितंबर को सरेंडर की खबर आई, पटेल के चेहरे पर एक गहरा संतोष था। उन्होंने कहा था कि अब जाकर भारत माता की तस्वीर पूरी हुई है।

17 सितंबर को मराठवाडा मुक्ति संग्राम दिवस

यही कारण है कि जहां पूरा भारत 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाता है, वहीं महाराष्ट्र का मराठवाड़ा क्षेत्र हर साल 17 सितंबर को 'मराठवाड़ा मुक्ति संग्राम दिन' के रूप में अपनी दूसरी आजादी का जश्न मनाता है।

आज सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती के इस विशेष अवसर पर, महाराष्ट्र की मिट्टी लौह पुरुष के उस ऐतिहासिक फैसले को नमन करती है।

अगर उस वक्त सरदार पटेल ने वह लौह संकल्प न दिखाया होता, तो आज महाराष्ट्र का नक्शा वैसा नहीं होता जैसा हम देखते हैं। सरदार पटेल केवल देश को जोड़ने वाले नेता नहीं थे, बल्कि वे मराठवाड़ा की लाखों जिंदगियों को गुलामी के नर्क से निकालने वाले सच्चे मसीहा थे।

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