पुणे में प्रदूषण नियंत्रण के ₹275 करोड़ खर्च, फिर भी समस्या बरकरार।
पीएम 10 स्तर 101, राष्ट्रीय मानक 60 से अधिक।
विशेषज्ञों ने धूल नियंत्रण और सार्वजनिक परिवहन सुधार पर जोर दिया।
Pune Air Action Hub Report: पुणे शहर में वायु प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) और 15वें वित्त आयोग के तहत मिले कुल 418.45 करोड़ रुपये में से करीब 66 प्रतिशत यानी 275.28 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं। इसके बावजूद पुणे में प्रदूषण की समस्या गंभीर बनी हुई है।
वर्ष 2025-26 में पीएम 10 की वार्षिक औसत सांद्रता 101 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर दर्ज की गई, जो राष्ट्रीय मानक 60 माइक्रोग्राम से काफी अधिक है। ऐसे में विशेषज्ञों ने प्रदूषण के मूल स्रोतों की पहचान कर वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर प्रभावी उपाय करने की जरूरत जताई है।
केंद्र सरकार के राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम की निगरानी करने वाले पीआरएएनए पोर्टल के आंकड़ों के अनुसार, पुणे को एनसीएपी के तहत 9.45 करोड़ रुपये और 15वें वित्त आयोग के तहत 409 करोड़ रुपये उपलब्ध कराए गए।
सूचना का अधिकार के तहत मिली जानकारी के अनुसार, इस निधि का इस्तेमाल सड़क सुधार, सार्वजनिक परिवहन, कचरा प्रबंधन और अंतिम संस्कार सुविधाओं के विकास सहित विभिन्न कार्यों पर किया गया। निधि से शहर में 121.4 किलोमीटर सड़कों का डामरीकरण और 19 किलोमीटर फुटपाथों की मरम्मत की गई। धूल नियंत्रण के लिए दो मैकेनिकल रोड स्वीपिंग मशीनें और 19 सप्रिंकलर लगाए गए।
सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करने के लिए 36 नई इलेवट्रिक बसें और 65 चार्जिंग स्टेशन शुरू किए गए। इसके अलावा छह सूखा कचरा संकलन केंद्र और निर्माण एवं विध्वंस कचरे के लिए चार केंद्र स्थापित किए गए।
हालांकि, इन प्रयासों के बावजूद पीएम 10 प्रदूषण में अपेक्षित कमी नहीं आई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2019-20 में पीएम 10 का स्तर 81 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर था, जो 2020-21 में घटकर 69 पर आ गया। इसके बाद इसमें लगातार वृद्धि हुई और 2025-26 में यह सात वर्षों के उच्चतम स्तर 101 पर पहुंच गया।
सोसायटी फॉर इनडोर एनवायरनमेंट के अध्यक्ष डॉ। राकेश कुमार के अनुसार, पुणे शहर में प्रदूषण का स्वरूप बदलने के संकेत मिल रहे हैं।
बीएस-वीआई वाहनों, स्वच्छ ईंधन और इलेक्ट्रिक बसों के बढ़ते इस्तेमाल से पीएम 2.5 के स्तर में कमी आने में मदद मिली सकती है। इसके विपरीत, शहरी विस्तार, मेट्रो परियोजनाओं, सड़क चौड़ीकरण, कांक्रीटीकरण और निर्माण कार्यों के कारण बड़े धूलकणों का उत्सर्जन जारी है।
मशीनें खरीदने के बजाय यह देखना 66 चाहिए कि कितनी सड़के साफ हुई, सफाई कितनी बार की गई, मशीनें कितने समय तक चलीं और जमा धूल का निपटारा कैसे हुआ। निजी वाहनों पर निर्भरता घटाकर बस और मेट्रो की एकीकृत सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को मजबूत करना भी जरूरी है। प्रदूषण नियंत्रण के लिए निधि का बड़ा हिस्सा उन स्रोतों पर केंद्रित होना चाहिए, जहां से वास्तव में प्रदूषण पैदा होता है।शर्मिला देव, पुणे एयर एक्शन हब