PCMC BJP Internal Rift Ravindra Chavan Visit: पिंपरी-चिंचवड़ मनपा (पीसीएमसी) में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को लगातार दूसरी बार एकतरफा सत्ता हासिल किए हुए आठ महीने बीत चुके हैं, लेकिन पार्टी के भीतर मची अंदरूनी कलह और गुटबाजी ने भगवा खेमे की साख को बट्टा लगा दिया है।
कामकाज पर अपेक्षित पकड़ बनाने में नाकामी, आमसभा में नगरसेवकों का बागी रुख और समन्वय के भारी अभाव से उत्पन्न गंभीर स्थिति का संज्ञान लेते हुए प्रदेशाध्यक्ष रवींद्र चव्हाण ने शहर में डेरा डाला और डैमेज कंट्रोल की कवायद की।
मंगलवार को दिनभर चले बैठकों के दौर में प्रदेशाध्यक्ष ने प्रमुख पदाधिकारियों के घर जाकर व्यक्तिगत मुलाकातें कीं और फिर कोर कमेटी की मैराथन बैठक ली। सूत्रों के अनुसार, बैठक में चव्हाण ने दो टूक शब्दों में नसीहत दी कि संगठन और जनप्रतिनिधियों के बीच तालमेल अनिवार्य है।
सभी निर्णय आपसी सहमति से लिए जाएं और पार्टी के आंतरिक मतभेद सार्वजनिक मंचों पर उजागर न हों। अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं की जाएगी। शीर्ष नेतृत्व की इस सीधी दखलंदाजी के बाद अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या पिंपरी भाजपा का अंतर्कलह वाकई थमता है या यह केवल कागजी चेतावनी साबित होती है।
फरवरी में दोबारा सत्ता की कमान संभालने के बाद से भाजपा प्रशासन पिंपरी-चिंचवड़ शहर की जनसमस्याओं के समाधान के बजाय अपने ही आंतरिक विवादों और फैसलों पर यू-टर्न लेने के कारण सुर्खियों में रही है। फर्जी उपसूचनाओं के आधार पर ठेकेदारों को लगभग 60 करोड़ रुपये के भुगतान का मामला खुला तो पार्टी के भीतर के मतभेद खुलकर सड़क पर आ गए। इसके अलावा, तीन शहर अभियंताओं के नए पद सृजित करने के निर्णय की चौतरफा आलोचना
पार्टी के भीतर मचे घमासान की सबसे बड़ी वजह 'स्वीकृत नगरसेवकों' (नॉमिनेटेड काउंसलर) की नियुक्ति को लेकर चल रहा शीतयुद्ध है।
मार्च महीने से लंबित इस दस सदस्यीय कोटे के प्रस्ताव परवान नहीं चढ़ पा रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि भाजपा के एक धड़े द्वारा विरोधी दल से जुड़े दो नामों का कड़ा विरोध किए जाने के कारण मामला अटका है।
दूसरी ओर, महापौर रवि लांडगे इस मसले को तत्काल सुलझाने उम्मीदवारों का समय बर्बाद हो रहा है। इसी खींचतान के बीच, बिना किसी को विश्वास में लिए स्वीकृत नगरसेवकों का दफ्तरी दाखिल प्रस्ताव महापौर द्वारा दोबारा कार्यसूची में शामिल किए जाने पर पार्टी के भीतर भूचाल आ गया।
असंतोष इस हद तक बढ़ा कि अगस्त की के पक्ष में है, क्योंकि फैसले के अभाव में पार्टी के संभावित आमसभा ही स्थगित करनी पड़ी। इस हाई-वोल्टेज ड्रामे के बाद महापौर ने सीधे वरिष्ठ नेतृत्व से शिकायत की, जिसके परिणामस्वरूप सदन के नेता प्रशांत शितोले को कोर कमेटी से बाहर का रास्ता देखना पड़ा।
मंगलवार को हुई कोर कमेटी की बैठक में स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के चुनाव की आचार संहिता समाप्त होने के बाद ही स्वीकृत नगरसेवकों की नियुक्ति पर अंतिम मुहर लगाने का निर्णय लिया गया। बैठक में यह पुरजोर मांग भी उठी कि इस पद पर केवल पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ताओं को ही अवसर मिलना चाहिए। वर्तमान में अक्टूबर के अंत तक आचार संहिता लागू रहने की संभावना है, ऐसे में सभी की निगाहें इस बात पर टिकी है कि नवंबर की आमसभा में यह पेच सुलझ पाता है या नहीं।
बहरहाल, प्रदेशाध्यक्ष रवींद्र चव्हाण के हस्तक्षेप से फिलहाल सियासी पारा कुछ नीचे आया जरूर है, लेकिन पिछले आठ महीनों में जिस प्रकार हर अहम फैसले पर अंतर्कलह खुलकर सामने आई है। उसे देखते हुए केवल चेतावनी से गुटबाजी का खात्मा होना मुश्किल नजर आता है। पार्टी के भीतर की यह सुलगती आग किसी भी नए सियासी मोड़ पर फिर भड़क सकती है।