Baramati Congress Candidate: महाराष्ट्र की सबसे हॉट सीट बारामती के विधानसभा उपचुनाव को लेकर सियासी ड्रामा चरम पर पहुँच गया है। उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार द्वारा नामांकन दाखिल किए जाने के बाद अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या कांग्रेस अपने उम्मीदवार आकाश विजयराव मोरे का नाम वापस लेगी। सुनेत्रा पवार के हालिया बयानों ने इन अटकलों को हवा दे दी है कि महायुति के नेता कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व के साथ संपर्क साधकर इस चुनाव को 'निर्विरोध' संपन्न कराने की अंतिम कोशिश कर रहे हैं।
सुनेत्रा पवार ने नामांकन के बाद पत्रकारों से भावुक होकर बात करते हुए कहा, "यह मेरे जीवन का सबसे कठिन चुनाव है। ऐसा समय ईश्वर किसी पर भी न लाए।" उन्होंने जानकारी दी कि एनसीपी नेता प्रफुल्ल पटेल और वे स्वयं कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से संपर्क करने की कोशिश कर रहे हैं। उनका उद्देश्य कांग्रेस नेतृत्व से यह अनुरोध करना है कि अजित पवार के प्रति सम्मान प्रकट करते हुए इस चुनाव को निर्विरोध होने दिया जाए।
एक तरफ जहाँ सुनेत्रा पवार समझौते की उम्मीद कर रही हैं, वहीं कांग्रेस के भीतर से तीखे सुर सुनाई दे रहे हैं। वरिष्ठ कांग्रेस नेता हुसैन दलवई ने पार्टी के फैसले का पुरजोर समर्थन किया है। दलवई ने 'परंपरा' की बात करने वालों को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि भाजपा ने खुद कई बार ऐसी परंपराओं को तोड़ा है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब विपक्ष के उम्मीदवारों का निधन होता है, तब क्या सत्तापक्ष निर्विरोध चुनाव की बात करता है?
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हुसैन दलवई के अनुसार, बारामती में कांग्रेस का आधार बेहद मजबूत है और उनके उम्मीदवार आकाश मोरे पिछड़े वर्ग से आते हैं। उन्होंने कहा, "वहाँ सिर्फ कांग्रेस का उम्मीदवार ही जीत सकता है। हमारी पार्टी ने जो फैसला लिया है, वह बिल्कुल सही है।" कांग्रेस का यह रुख स्पष्ट करता है कि स्थानीय इकाई इस सीट पर पवार परिवार को वाकओवर देने के मूड में नहीं है। कांग्रेस नेताओं का तर्क है कि लोकतंत्र में चुनाव लड़ना उनका अधिकार है और वे इसे 'स्वार्थ' नहीं मानते।
बता दें कि इसी वर्ष जनवरी में एक दुखद हवाई हादसे में अजित पवार के निधन के बाद यह सीट रिक्त हुई थी। सुनेत्रा पवार इस चुनाव को केवल अपना नहीं, बल्कि पूरे बारामती के लोगों का चुनाव बता रही हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि मल्लिकार्जुन खरगे इस मामले में हस्तक्षेप करते हैं, तभी कांग्रेस पीछे हट सकती है। अन्यथा, 23 अप्रैल को बारामती की धरती पर एक तरफ 'सहानुभूति' की लहर होगी और दूसरी तरफ कांग्रेस का 'जातीय और सांगठनिक' समीकरण।