प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स: सोशल मीडिया ) 
महाराष्ट्र

एनटीसीए का बड़ा फैसला; महाराष्ट्र में अभयारण्यों के बाहर रह रहे बाघों के लिए पहली बार 5.40 करोड़ की मंजूरी

NTCA Maharashtra Fund News: महाराष्ट्र में अभयारण्यों के बाहर रह रहे 180 बाघों के प्रबंधन के लिए एनटीसीए ने 5.40 करोड़ रुपये मंजूर किए, मानव-बाघ संघर्ष से निपटने को 6 वन प्रभागों को मिलेगा 90 लाख रुपय

रूपम सिंह

Maharashtra Forest Department News: महाराष्ट्र में नामित बाघ अभयारण्यों के बाहर रह रहे बाघों के संरक्षण और प्रबंधन के लिए राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) ने पहली बार विशेष रूप से धनराशि स्वीकृत की है। अधिकारियों ने गुरुवार को यह जानकारी देते हुए बताया कि यह निर्णय मानव-बाघ संघर्ष की बढ़ती घटनाओं और संरक्षित क्षेत्रों के बाहर बाघों की बढ़ती उपस्थिति को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।

चंद्रपुर सहित 6 प्रमुख वन प्रभागों को मिलेंगे 90 लाख रुपये

अधिकारियों के अनुसार, एनटीसीए ने 10 फरवरी को ‘बाघ अभयारण्यों के बाहर बाघों का प्रबंधन: मानव-बाघ संघर्ष से निपटने की रणनीतियां’ परियोजना के तहत वर्ष 2025-26 के लिए 5.40 करोड़ रुपये जारी करने की मंजूरी दी है। यह राशि महाराष्ट्र के छह वन प्रभागों चंद्रपुर, ब्रह्मपुरी, सेंट्रल चंदा, नागपुर, पंढरकौड़ा और वड़सा को उपलब्ध कराई जाएगी। परियोजना के अंतर्गत प्रत्येक वन प्रभाग के लिए 90 लाख रुपये का प्रावधान किया गया है।

यह धनराशि राष्ट्रीय क्षतिपूर्ति वनीकरण कोष प्रबंधन एवं योजना प्राधिकरण (सीएएमपीए) के ढांचे के अंतर्गत स्वीकृत की गई है। अधिकारियों का कहना है कि इस राशि का उपयोग अभयारण्यों के बाहर रह रहे बाघों की निगरानी, उनके मूवमेंट के अध्ययन, मानव-बाघ संघर्ष की रोकथाम, त्वरित प्रतिक्रिया दलों की स्थापना, स्थानीय समुदायों को जागरूक करने और आवश्यक सुरक्षा उपायों को मजबूत करने में किया जाएगा।

अभयारण्यों के बाहर रह रहे करीब 180 बाघों की निगरानी

भारतीय वन सेवा (आईएफएस) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि वर्तमान में महाराष्ट्र में लगभग 180 बाघ ऐसे हैं, जो बाघ अभयारण्यों और संरक्षित क्षेत्रों के बाहर के जंगलों तथा राजस्व भूमि क्षेत्रों में रह रहे हैं। इन क्षेत्रों में मानव आबादी और वन्यजीवों के बीच संपर्क अधिक होने के कारण संघर्ष की आशंका भी बढ़ जाती है। पिछले कुछ वर्षों में राज्य के कई हिस्सों में मानव-बाघ संघर्ष की घटनाएं सामने आई हैं, जिनमें जान-माल का नुकसान हुआ है।

विशेषज्ञों का मानना है कि महाराष्ट्र में बाघों की संख्या में वृद्धि संरक्षण प्रयासों की सफलता का संकेत है, लेकिन इसके साथ ही नए आवास क्षेत्रों में बाघों की मौजूदगी से प्रबंधन की चुनौतियां भी बढ़ी हैं। अभयारण्यों के बाहर के वन क्षेत्र, कृषि भूमि के आसपास के जंगल और मानव बस्तियों से सटे इलाके अब बाघों की गतिविधियों के केंद्र बन रहे हैं। ऐसे में वैज्ञानिक प्रबंधन और समुदाय आधारित संरक्षण रणनीतियों की आवश्यकता महसूस की जा रही थी।

राजस्व भूमि और कृषि क्षेत्रों में भी सुरक्षित रहेंगे बाघ

वन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि इस परियोजना के तहत बाघों की रेडियो कॉलरिंग, कैमरा ट्रैप की संख्या बढ़ाना, संवेदनशील गांवों में जागरूकता कार्यक्रम चलाना, पशुधन की सुरक्षा के उपाय, और मुआवजा प्रक्रिया को तेज करने जैसे कदम उठाए जाएंगे। इसके अलावा, स्थानीय स्तर पर त्वरित बचाव एवं प्रतिक्रिया दल को सशक्त किया जाएगा ताकि किसी भी आपात स्थिति में तुरंत कार्रवाई की जा सके।

एनटीसीए द्वारा अभयारण्यों के बाहर बाघों के प्रबंधन के लिए अलग से धनराशि स्वीकृत किया जाना एक महत्वपूर्ण नीति पहल माना जा रहा है। अब तक संरक्षण योजनाएं मुख्य रूप से टाइगर रिजर्व और संरक्षित क्षेत्रों तक सीमित रहती थीं, लेकिन बाघों के बदलते व्यवहार और बढ़ती संख्या को देखते हुए संरक्षण का दायरा विस्तारित करना आवश्यक हो गया है।

राज्य के वन अधिकारियों ने उम्मीद जताई है कि इस वित्तीय सहायता से मानव-बाघ संघर्ष की घटनाओं में कमी आएगी, स्थानीय लोगों का सहयोग बढ़ेगा और बाघों के दीर्घकालीन संरक्षण को मजबूती मिलेगी। उन्होंने यह भी कहा कि सामुदायिक भागीदारी, वैज्ञानिक निगरानी और त्वरित मुआवजा व्यवस्था ही इस परियोजना की सफलता की कुंजी होगी।

महाराष्ट्र पहले से ही देश के प्रमुख बाघ बहुल राज्यों में शामिल है। ऐसे में अभयारण्यों के बाहर रह रहे बाघों के प्रभावी प्रबंधन की दिशा में यह कदम राज्य और देश, दोनों के लिए संरक्षण की दृष्टि से अहम माना जा रहा है।

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