छात्र व शिक्षक की प्रतीकात्मक फोटो (सोर्स: सोशल मीडिया) 
नासिक

शिक्षा विभाग की सर्जिकल स्ट्राइक: आधार कार्ड के फेर में फंसी स्कूलों की छात्र संख्या व शिक्षकों का भविष्य

Education Department: नासिक में स्कूलों के अनुदान और शिक्षकों के समायोजन को लेकर शिक्षा विभाग ने छात्र संख्या वेरिफिकेशन शुरू किया है, आधार कार्ड अनिवार्य होने से अतिरिक्त शिक्षकों की समस्या बढ़ी है।

गोरक्ष पोफली

Nashik School Education Department: महाराष्ट्र के शिक्षा विभाग ने स्कूलों में होने वाली वित्तीय अनियमितताओं और फर्जी छात्र संख्या (Bogus Enrollment) को रोकने के लिए अब तक का सबसे कड़ा रुख अपनाया है। नासिक जिले में शुरू की गई 'छात्र संख्या सत्यापन' प्रक्रिया ने न केवल स्कूल प्रबंधन बल्कि शिक्षकों के बीच भी भारी हलचल पैदा कर दी है। सरकार का स्पष्ट संदेश है कि अब अनुदान पाने के लिए कागजी आंकड़ों की मनमानी नहीं चलेगी।

आधार कार्ड बना अनिवार्य पैमाना

राज्य सरकार के नए दिशा-निर्देशों के अनुसार, कक्षा 1 से 11वीं तक के प्रत्येक छात्र का आधार कार्ड (Aadhaar Card) होना और उसका डेटा 'यू-डायस' (U-DISE) पोर्टल पर मैच होना अनिवार्य है। यदि किसी छात्र का आधार विवरण पोर्टल पर त्रुटिपूर्ण पाया जाता है या आधार कार्ड उपलब्ध नहीं है, तो उसे आधिकारिक गणना से बाहर कर दिया जाएगा। सरकार ने सभी स्कूलों को 30 तारीख तक सारा डेटा अपडेट करने का अंतिम अवसर दिया है।

जिले में हजारों छात्र गिनती से बाहर

शिक्षा विभाग की इस सख्ती के बाद जिले के सरकारी और निजी स्कूलों में खलबली मच गई है। वर्तमान में जो आंकड़े सामने आए हैं, वे चौंकाने वाले हैं:

  • मनपा स्कूल: लगभग 950 छात्र आधार विसंगतियों के कारण सूची से बाहर हैं।
  • जिला परिषद स्कूल: करीब 1,500 छात्रों का डेटा अधूरा है।
  • निजी स्कूल: लगभग 2,500 छात्र तकनीकी कारणों से सिस्टम से बाहर हो रहे हैं। वर्तमान में नासिक के करीब 450 स्कूलों में गहन जांच चल रही है, जिससे 'बोगस बनाम असली' छात्र संख्या का विवाद और गहरा गया है।

अतिरिक्त शिक्षक का संकट

इस पूरी प्रक्रिया का सबसे घातक परिणाम शिक्षकों पर पड़ रहा है। शिक्षा विभाग के नियमों के अनुसार, स्कूलों में शिक्षकों के पदों की स्वीकृति सीधे तौर पर छात्रों की संख्या पर निर्भर करती है। चूंकि आधार की अनिवार्यता के कारण वैध छात्रों की संख्या कम दिख रही है, इसलिए कई अनुभवी शिक्षकों को 'अतिरिक्त' घोषित किया जा रहा है। इन शिक्षकों को अब अपने मूल स्कूल छोड़कर दूसरे स्कूलों में स्थानांतरित होने पर मजबूर होना पड़ रहा है, जिससे उनकी वर्षों की सेवा और वरिष्ठता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

व्यवस्था की कमी या प्रशासनिक सख्ती?

मुख्याध्यापक संगठन के अध्यक्ष नंदलाल धांडे ने इस स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने तर्क दिया कि स्लम और ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले कई बच्चों के पास आज भी पर्याप्त दस्तावेज नहीं हैं। स्कूलों का उद्देश्य बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा में लाना है, लेकिन अब आधार की तकनीकी अनिवार्यता शिक्षकों के लिए 'सिरदर्द' बन गई है। एक ओर शिक्षकों पर 11, 15 और 22 अप्रैल को होने वाली संकलित मूल्यांकन परीक्षाओं का दबाव है, तो दूसरी ओर डेटा अपडेट करने की टेंशन।

शिक्षा विभाग की इस कार्रवाई का उद्देश्य भले ही पारदर्शिता लाना हो, लेकिन आधार की इस 'सर्जिकल स्ट्राइक' ने शिक्षकों के करियर को दांव पर लगा दिया है। अब देखना यह होगा कि क्या सरकार इस जटिल प्रक्रिया में कुछ ढील देती है या हजारों शिक्षक 'अतिरिक्त' घोषित होकर विस्थापन का दर्द झेलेंगे।

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