Shirish Kumar Mehta Nandurbar Martyr Story: स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कई ऐसी गाथाएं दर्ज हैं, जिन्हें पढ़कर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। बात 1942 के 'भारत छोड़ो आंदोलन' की है। जब देश का बच्चा-बच्चा सड़कों पर 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' और 'वंदे मातरम' के नारे लगा रहा था, तब महाराष्ट्र और गुजरात की सीमा पर बसे नंदुरबार गांव से एक ऐसा 16 साल का लड़का निकला, जिसने ब्रिटिश हुकूमत के गुरूर को पूरी तरह चकनाचूर कर दिया। उस वीर बाल क्रांतिकारी का नाम था शिरीष कुमार मेहता।
शिरीष कुमार मेहता का जन्म 28 दिसंबर 1926 को नंदुरबार के एक व्यापारी परिवार में हुआ था। वह अपने माता-पिता की इकलौती संतान थे। बचपन से ही उनकी माता उन्हें स्वतंत्रता सेनानियों और भारत मां के वीर सपूतों की कहानियां सुनाया करती थीं। शिरीष कुमार पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस के विचारों का गहरा प्रभाव था। महज 12 साल की उम्र में ही वे अपने दादाजी के हाथ में हाथ डालकर तिरंगा लहराते हुए आजादी की रैलियों में शामिल होने लगे थे।
महात्मा गांधी द्वारा शुरू किए गए भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान 9 सितंबर 1942 को नंदुरबार शहर में देशभक्तों ने एक विशाल जुलूस निकाला। इस जुलूस का नेतृत्व 16 साल के शिरीष कुमार हाथों में तिरंगा झंडा थामे कर रहे थे। उनके साथ उनके साथी लालदास, धनसुख लालवानी, शशिधर केतकर और घनश्याम दास शाह भी जुलूस में पूरे जोश के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहे थे।
अपनी मातृभाषा गुजराती में शिरीष कुमार देशप्रेम के गीतों और गगनभेदी नारों से पूरे माहौल को देशभक्ति के रंग में रंग रहे थे- "नहीं शमसे, नहीं शमसे, निशान भूमि भारतभूनी... भारत माता की जय... वंदे मातरम!"
जैसे ही यह जुलूस नंदुरबार शहर के बीचों-बीच पहुंचा, ब्रिटिश पुलिस अफसरों ने जुलूस को रोकने का प्रयास किया और बिना किसी चेतावनी के लाठीचार्ज का आदेश दे दिया। लाठियां बरसने के बावजूद भीड़ पीछे हटने को तैयार नहीं थी। शिरीष कुमार और उनके साथी हाथों में तिरंगा लिए मोर्चे पर डटे रहे।
भीड़ के अडिग इरादों को देखकर अंग्रेज अफसर बौखला गया और उसने अपनी बंदूक प्रदर्शनकारियों की तरफ तान दी। यह देखते ही 16 साल के शिरीष कुमार निडर होकर उस अंग्रेज अफसर के सामने जाकर खड़े हो गए और गरज कर बोले- "अगर तुम्हें गोली मारनी ही है, तो मासूमों पर नहीं, पहले मुझे मारो!"
अंग्रेज अफसर गुस्से से लाल हो गया और उसने शिरीष कुमार के सीने पर एक के बाद एक 4 गोलियां दाग दीं। गोलियों से छलनी होने के बावजूद शिरीष कुमार ने हाथों से तिरंगा नहीं छूटने दिया। वे भारत माता की जय बोलते हुए वहीं धाराशाई हो गए। उनके साथ खड़े उनके साथियों धनसुख लालवानी, शशिधर केतकर, लालदास और घनश्याम दास को भी अंग्रेजों ने गोलियों से भून दिया।
नंदुरबार की उस पवित्र धरती पर 16 साल की छोटी सी उम्र में शिरीष कुमार और उनके पांचों बाल साथियों ने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान दे दिया। आज भी नंदुरबार का 'शहीद स्मारक' इस बात की गवाही देता है कि आजादी की कीमत कितनी बड़ी थी।