बाल गंगाधर तिलक पुण्यतिथि: जब जिन्ना-तिलक की जोड़ी ने हिला दी थी ब्रिटिश हुकूमत, जानिए लखनऊ पैक्ट की कहानी

Bal Gangadhar Tilak Death Anniversary: लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की पुण्यतिथि पर जानिए 1916 के लखनऊ पैक्ट का इतिहास, जब कड़क सनातनी तिलक और मोहम्मद अली जिन्ना ने मिलकर अंग्रेजों की चूलें हिला दी थीं।
Bal Gangadhar Tilak
बाल गंगाधर तिलक (सोर्स: सोशल मीडिया)
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Bal Gangadhar Tilak Lucknow Pact 1916 Special: आज का दौर राजनीतिक ध्रुवीकरण का दौर है, जहां इतिहास के पन्नों को अक्सर सहूलियत के हिसाब से पढ़ा जाता है। लेकिन भारत के स्वतंत्रता संग्राम का एक पन्ना ऐसा भी है, जो आज के समय में अकल्पनीय लगता है। यह कहानी है साल 1916 की, जब 'हिंदू राष्ट्रवाद के प्रणेता' कहे जाने वाले लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और बाद में पाकिस्तान के निर्माता बने मोहम्मद अली जिन्ना ने हाथ मिलाया था। इन दो विपरीत विचारधाराओं के नेताओं ने मिलकर ब्रिटिश हुकूमत की चूलें हिला दी थीं। इस ऐतिहासिक मिलन को इतिहास 'लखनऊ पैक्ट' के नाम से जानता है।

आज 1 अगस्त को लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की पुण्यतिथि है। 1 अगस्त 1920 को मुंबई में उनका निधन हुआ था। जुलाई 1920 में अत्यधिक उम्र और बीमारी के कारण उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया था। आइए इस अवसर पर जानते हैं कि कैसे इन दो दिग्गजों ने मिलकर अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिला दी थी।

जब बिखरा हुआ था देश का राजनीतिक नेतृत्व

साल 1916 से पहले भारत का स्वतंत्रता आंदोलन बिखरा हुआ था। 1907 के सूरत अधिवेशन में कांग्रेस दो धड़ों में बंट चुकी थी। एक नरम दल और दूसरा गरम दल। बाल गंगाधर तिलक गरम दल के सबसे बड़े नेता थे।

इस दौर में 1906 में बनी ऑल इंडिया मुस्लिम लीग उस समय तक कांग्रेस की राजनीति से अलग अपनी राह चल रही थी। अंग्रेज हुकूमत 'फूट डालो और राज करो' की नीति पर पूरी तरह हावी थी। उन्हें लगता था कि भारतीय कभी एक मंच पर नहीं आ सकते।

तिलक और जिन्ना का समीकरण: राष्ट्रवाद का कॉमन ग्राउंड

इस बिखराव को दूर करने के लिए दो ऐसे नेता सामने आए जिनकी छवि एक-दूसरे से बिल्कुल अलग थी। महाराष्ट्र से मराठा नेता बाल गंगाधर तिलक एक कड़क सनातनी, जिन्होंने गणेशोत्सव और शिवाजी जयंती के जरिए जनता को जगाया। अंग्रेजों के लिए वह भारतीय अशांति के जनक थे।

वहीं दूसरी ओर मोहम्मद अली जिन्ना उस दौर में एक सेक्युलर, अंग्रेजी तौर-तरीकों को अपनाने वाले और कानून के पक्के वकील थे। उन्हें सरोजिनी नायडू ने 'हिंदू-मुस्लिम एकता का राजदूत' कहा था। जिन्ना उस समय कांग्रेस और मुस्लिम लीग, दोनों के सदस्य थे। दोनों नेताओं का मानना था कि जब तक हिंदू और मुस्लिम एक साथ आकर स्वराज्य की मांग नहीं करेंगे, अंग्रेज भारत छोड़कर नहीं जाएंगे।

लखनऊ पैक्ट दिसंबर 1916: इतिहास की सबसे बड़ी राजनीतिक घटना

दिसंबर 1916 में कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों के वार्षिक अधिवेशन लखनऊ में हुए। बाल गंगाधर तिलक 6 साल की मंडाले जेल की सजा काटने के बाद पूरी ऊर्जा के साथ राजनीति में लौटे थे। उन्होंने कांग्रेस के नरम दल जिसका नेतृत्व अब एनी बेसेंट और अन्य कर रहे थे और मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व वाली मुस्लिम लीग के बीच मध्यस्थता की।

Bal Gangadhar Tilak Lucknow Pact 1916 Special
लखनऊ पैक्ट पर हस्ताक्षर करते मोहम्मद अली जिन्ना (सोर्स: सोशल मीडिया)

लखनऊ पैक्ट की मुख्य बातें क्या थीं?

दोनों दलों ने अंग्रेजों के सामने एक सुर में स्वराज की मांग रखी। कांग्रेस ने प्रांतीय विधानमंडलों में मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र की मांग को स्वीकार कर लिया। साथ ही यह सहमति बनी कि केंद्र और प्रांतों में भारतीयों को अधिक प्रतिनिधित्व मिले, जिसमें अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा हो।

तिलक का ऐतिहासिक रुख: मुझे कोई आपत्ति नहीं

मुस्लिम लीग को अलग निर्वाचन क्षेत्र देने पर कांग्रेस के भीतर मदन मोहन मालवीय जैसे कुछ नेता असहमत थे। तब बाल गंगाधर तिलक ने मंच से एक ऐसा भाषण दिया जिसने सबका मुंह बंद कर दिया। उन्होंने ने कहा था कुछ लोगों का कहना है कि हिंदुओं ने अपने मुस्लिम भाइयों को बहुत अधिक रियायतें दे दी हैं। मैं कहता हूं कि अगर स्वराज का अधिकार सिर्फ मुस्लिम समुदाय को भी दे दिया जाए, या सिर्फ राजपूतों को, या सिर्फ अछूतों को ही दे दिया जाए, तो भी मुझे कोई आपत्ति नहीं होगी। हमारी लड़ाई अंग्रेजों से है, अपनों से नहीं। यह तिलक की राजनीतिक दूरदर्शिता थी जिसने समझौते को टूटने से बचा लिया।

लखनऊ पैक्ट का भारत की आजादी पर क्या असर हुआ?

लखनऊ पैक्ट के बाद हिंदू-मुस्लिम एकता को देखकर अंग्रेज हैरान रह गए। इसी दबाव का नतीजा था कि अगस्त 1917 में मोंटेग्यू चेम्सफोर्ड घोषणा हुई, जिसमें अंग्रेजों ने पहली बार माना कि उनका लक्ष्य भारत में क्रमिक रूप से जिम्मेदार सरकार की स्थापना करना है। लखनऊ पैक्ट ने देश में जो एकता पैदा की, उसी की जमीन पर आगे चलकर महात्मा गांधी ने खिलाफत आंदोलन और असहयोग आंदोलन की इतनी बड़ी इमारत खड़ी की।

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