Nana Patekar Farmers Social Service Maharashtra : वैसे अगर देखा जाए तो बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता नाना पाटेकर अपनी दमदार आवाज और शानदार अदाकारी के लिए जाने जाते हैं। इसके दम पर एक ओर जहां उन्होंने फिल्मों में तो अपने अभिनय का लोहा मनवाया ही है,
लेकिन असल जिंदगी में भी वे किसी नायक से कम नहीं रहे। वे अपने राज्य महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त इलाकों और किसानों के लिए कुछ करना चाहते थे, क्योंकि किसानों की दयनीय स्थिति को देखकर उनका दिल पसीज गया था।
आइए डालते हैं नाना पाटेकर और उनके फाउंडेशन द्वारा किए गए कुछ सबसे प्रमुख कार्यों पर एक नजर, जो पूरे देश में चर्चा में अक्सर आते रहे हैं....
सूखे के कारण फसल बर्बाद होने से जिन किसानों ने हताश होकर आत्महत्या कर ली थी, नाना पाटेकर ने सबसे पहले उन परिवारों का आंसू पोंछने का काम किया। उन्होंने खुद सूखाग्रस्त गांवों का दौरा किया और सैकड़ों शहीद किसान परिवारों को 15,000 रुपए से लेकर 50,000 रुपए तक की सीधी आर्थिक सहायता पहुंचाई।
इसके साथ ही उन्होंने विधवा महिलाओं को सिलाई मशीनें और रोजगार के अन्य साधन मुहैया कराए ताकि वे सम्मान से जी सकें। किसानों की विधवाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए सिलाई मशीनों के साथ-साथ अनाज पीसने की चक्कियां और आजीविका के दूसरे साधन भी बांटे गए।
ऐसा कहा जाता है कि महाराष्ट्र के किसानों की आत्महत्या और कर्ज के बढ़ते बोझ ने उन्हें झकझोर दिया, जिसके बाद उन्होंने साल 2015 में अपने साथी कलाकार मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर 'नाम फाउंडेशन' (NAAM Foundation) की स्थापना की, ताकि जमीनी स्तर पर जाकर कुछ अलग किया जा सके।
फिल्मों में व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने वाले नाना पाटेकर ने साल 2015 में जब महाराष्ट्र का मराठवाड़ा और विदर्भ इलाका भीषण सूखे और किसानों की आत्महत्या के संकट से जूझ रहा था, तब नाना पाटेकर ने केवल दुख नहीं जताया, बल्कि खुद जमीन पर उतरकर काम शुरू किया। उन्होंने साथी अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर सूखाग्रस्त इलाकों और संकट में घिरे किसानों के लिए जो काम किए, उसकी हर कोई सराहना करता है।
नाना पाटेकर का मानना था कि सिर्फ पैसे बांटने से किसानों की समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा, इसके लिए पानी के संकट को दूर करना जरूरी है। 'नाम फाउंडेशन' ने बड़े पैमाने पर जल संरक्षण के लिए का काम शुरू किया। उनकी संस्था ने कई सूखाग्रस्त जिलों में नदियों और नालों को गहरा और चौड़ा करने का काम किया, जिससे बारिश का पानी रुक सके।
कहा जाता है कि संस्था ने लंबी नदियों के गाद को साफ किया गया, जिससे भूजल स्तर में बढोत्तरी हुयी। साथ ही साथ कई गांवों में चेक डैम और तालाबों का निर्माण कराया गया, जिससे आज हजारों एकड़ सूखी जमीन हरी-भरी हो चुकी है।
नाना पाटेकर ने सूखे और कंगाली की मार झेल रहे कई गांवों को गोद लिया। मराठवाड़ा के धोंदलगांव और आमला जैसे गांवों में उन्होंने बुनियादी ढांचे को पूरी तरह बदल दिया। जब शिरूर इलाके के एक गांव में भारी तबाही हुई, तो 'नाम फाउंडेशन' ने वहां के नागरिकों के लिए पक्के मकानों का निर्माण करवाकर उनका पूरा पुनर्वास किया। इसके अलावा, संस्था किसानों को आधुनिक खेती और जैविक खेती के गुर सिखाने के लिए प्रशिक्षण शिविर भी आयोजित करती है।
कहा जाता है कि अब नाना पाटेकर ने इस नेक काम के लिए अपनी जेब से करोड़ों रुपये दान किए और देश-विदेश से मिलने वाली मदद का एक-एक पैसा सीधे किसानों तक पहुंचाया। आज नाना पाटेकर महाराष्ट्र के किसानों के लिए केवल एक अभिनेता नहीं, बल्कि संकट के समय सहारा देने वाले एक मसीहा के रूप में पूजे जाते हैं।
इस तरह से देखा जाए तो करोड़ों दिलों पर राज करने वाले नाना पाटेकर ने अपनी फिल्मों की कमाई का एक बड़ा हिस्सा इस सामाजिक कार्य के लिए दान कर दिया। वे कैमरों की चमक-दमक से दूर रहकर सीधे गांवों में जाते हैं और किसानों के बीच जमीन पर बैठकर उनकी समस्याएं सुनते हैं। उनकी यह सादगी और संवेदनशीलता दिखावे से कोसों दूर है।
आज नाम फाउंडेशन ने महाराष्ट्र के हजारों परिवारों की तकदीर और तस्वीर दोनों बदल दी है। नाना पाटेकर ने यह साबित कर दिया है कि एक सच्चा कलाकार सिर्फ पर्दे पर ही नहीं, बल्कि समाज के बीच रहकर भी असली हीरो बन सकता है। उनका यह सामाजिक योगदान आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा एक मिसाल बना रहेगा।