Nagpur Poonam Chambers Illegal Construction: 'पूनम चैंबर' मामले में अवैध निर्माण के खिलाफ कड़ा संदेश देते हुए न्यायाधीश अनिल पानसरे और न्यायाधीश रजनीश व्यास ने मनपा क्षेत्र में स्थित 'पूनम चैंबर' के अवैध हिस्सों को ढहाने के मामले में सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए। साथ ही हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता नंद कुमार हरचंदानी की याचिका (रिट याचिका संख्या 998/2026) को खारिज कर दिया।
अदालत ने याचिकाकर्ता द्वारा अदालत की रजिस्ट्री में जमा की गई 10 लाख रुपये की राशि को जब्त करने का आदेश दिया। कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता अपने निर्माण के नियमितीकरण के समर्थन में कोई भी वैध दस्तावेज पेश करने में विफल रहा और बिना किसी उचित कारण के समय मांगकर अदालत का कीमती समय बर्बाद किया। इसके अलावा याचिकाकर्ता द्वारा अपमानजनक बयानबाजी भी की गई जिसके चलते यह राशि दंड स्वरूप जब्त कर ली गई और इसे 'पब्लिक वेलफेयर अकाउंट' (यूनियन बैंक ऑफ इंडिया) में ट्रांसफर करने का निर्देश दिया गया है।
सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि याचिकाकर्ता ने पहले अदालत में खुद ही 16 फरवरी 2026 से 10 अप्रैल 2026 के बीच अवैध निर्माण को हटाने का हलफनामा दिया था। जब वह ऐसा करने में विफल रहा तो अदालत ने मनपा को इस अवैध ढांचे को गिराने का निर्देश दिया था। मनपा ने अदालत को बताया कि अवैध निर्माण को हटाने का अनुमानित खर्च 31,40,000 रुपये है जिसे याचिकाकर्ता को वहन करने के लिए कहा गया है।
नागपुर मनपा के वकील ने कोर्ट में प्रगति रिपोर्ट पेश की जिसके अनुसार 'पूनम चैंबर' की 7वीं मंजिल को ढहाने का काम जोरों पर चल रहा है। 7वीं मंजिल के कुल 1175.42 वर्गमीटर के अवैध हिस्से में से 500 वर्गमीटर हिस्सा गिराया जा चुका है। अदालत ने बाकी बचे ढांचे को पूरी तरह से गिराने के लिए मनपा को 2 महीने का अतिरिक्त समय और दिया है। इसके साथ ही विजय बाभरे द्वारा दायर अन्य 2 याचिकाओं (रिट याचिका संख्या 198/2005 और 1025/2016) का भी निपटारा कर दिया गया है क्योंकि अवैध निर्माण गिराए जाने की प्रक्रिया के साथ उनका उद्देश्य पूरा हो गया है।
अदालत ने इस मामले में न केवल अवैध निर्माणकर्ता पर सख्ती दिखाई है बल्कि मनपा के तत्कालीन अधिकारियों की जवाबदेही भी तय करने का निर्णय लिया है। संबंधित अवधि के दौरान कार्यरत रहे तत्कालीन आयुक्तों और सहायक आयुक्तों को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है। उनसे पूछा गया है कि अवैध निर्माण को रोकने में विफल रहने पर उनके खिलाफ विभागीय व कानूनी कार्रवाई की सिफारिश क्यों न की जाए।
अपने विस्तृत आदेश में कोर्ट ने अवैध निर्माण पर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों (विशेषकर म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन ऑफ ग्रेटर मुंबई बनाम सनबीम हाई टेक डेवलपर्स और राजेंद्र कुमार बड़जात्या मामले) का प्रमुखता से उल्लेख किया, हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की उस टिप्पणी को दोहराया कि अवैध और अनधिकृत निर्माणों से 'लोहे के हाथों' यानी पूरी सख्ती से निपटना चाहिए और ऐसे मामलों में किसी भी प्रकार की सहानुभूति दिखाना गलत है क्योंकि यह शहरी विकास और पर्यावरण को अपूरणीय क्षति पहुंचाता है।