नागपुर हाईकोर्ट सुनवाई( सोर्स: सोशल मीडिया ) 
नागपुर

नागपुर: CBI जांच पर हाईकोर्ट में तीखी बहस, ट्रांसफर की मांग पर अदालत सख्त; मांगे दस्तावेज

Nagpur High Court Case: नागपुर हाईकोर्ट में सीबीआई जांच को लेकर बहस तेज। मनोज जायसवाल ने जांच दूसरी एजेंसी को सौंपने की मांग की, अदालत ने दस्तावेज पेश करने के निर्देश दिए।

अंकिता पटेल

Nagpur CBI Investigation Controversy: नागपुर जिले में सीबीआई द्वारा की जा रही जांच पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे दूसरी एजेंसी को हस्तांतरित करने की मांग करते हुए मनोज जायसवाल की ओर से हाई कोर्ट में फौजदारी याचिका दायर की गई जिस पर सुनवाई के दौरान अदालत में जांच एजेंसी (सीबीआई) की कार्यप्रणाली को लेकर तीखी बहस देखने को मिली।

बचाव पक्ष के वकील ने जांच अधिकारी (आईओ) पर कानून की धज्जियां उड़ाने और पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाने का आरोप लगाते हुए मामले की जांच को स्थानांतरित (ट्रांसफर) करने की मांग की है।

दूसरी ओर अदालत ने स्पष्ट किया कि गिरफ्तारी या वारंट जारी करने में हुई कथित अनियमितताओं के आधार पर पूरी जांच को किसी अन्य एजेंसी को नहीं सौंपा जा सकता।

दोनों पक्षों की दलीलों के बाद न्यायाधीश उर्मिला जोशी फालके और न्यायाधीश निवेदिता मेहता ने तथ्यों से संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत करने के आदेश याचिकाकर्ता को दिए।

जमानत रोकने के लिए चार्जशीट दाखिल करने का आरोप

बचाव पक्ष के वकील ने अदालत को बताया कि जब उनकी जमानत याचिका पर अंतिम सुनवाई होनी थी, तो उसे निषाभावी करने के लिए जांच एजेंसी ने ठीक एक दिन पहले विशेष अदालत में चार्जशीट दायर कर दी। इसके कारण उन्हें अपनी जमानत याचिका वापस लेनी पड़ी। हालांकि, अदालत ने उन्हें ट्रायल कोर्ट में नई याचिका दायर करने तक गिरफ्तारी से संरक्षण प्रदान किया था।

'गिरफ्तारी के तरीके को चुनौती दें, जांच ट्रांसफर नहीं होगी'

इन गंभीर आरोपों पर सुनवाई करते हुए न्यायाधीश उर्मिला जोशी फालके और न्यायाधीश निवेदिता मेहता ने कहा कि जांच एजेंसी को सीआरपीसी की धारा 173(8) के तहत आगे की जांच करने का अधिकार है, जज ने टिप्पणी की कि यदि गिरफ्तारी करने में या समन भेजने में कोई गैर कानूनी काम हुआ है, तो आरोपी उचित कानूनी कार्यवाही के तहत उसे चुनौती दे सकता है।

जज ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर बेटी को गलत तरीके से फंसाया गया है, तो उसके लिए अलग से अपील की जा सकती है लेकिन केवल इन त्रुटियों के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि पूरी जांच आरोपी के खिलाफ दुर्भावनापूर्ण है और इसे किसी दूसरी एजेंसी को सौप दिया जाना चाहिए, विरोधी पक्ष के वकील ने भी यह तर्क दिया कि कोई भी आरोपी यह तय नहीं कर सकता कि मामले की जांच कौन सी एजेंसी करेगी।

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