Mohan Bhagwat Independence Day Speech: 80वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के नागपुर स्थित मुख्यालय में विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया। संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने मुख्यालय परिसर में ध्वजारोहण कर भारत माता का पूजन किया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में स्वयंसेवक और नागरिक उपस्थित रहे। ध्वजारोहण के उपरांत अपने संबोधन में संघ प्रमुख ने देश की आजादी, पूर्वजों के त्याग-बलिदान और भविष्य के राष्ट्रीय कर्तव्यों पर विस्तार से अपने विचार व्यक्त किए।
RSS प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि स्वतंत्रता दिवस हम सभी के लिए परम गौरव और उत्सव का विषय है। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से लेकर 1947 तक, लगातार 90 वर्षों तक हमारे पूर्वजों ने अनेक कष्ट सहे और अपने सर्वोच्च बलिदान देकर हमें यह आजादी दिलाई।
मोहन भागवत ने कहा कि उस त्याग और बलिदान का गौरव हमारे मन में है और इसका आनंद हमारे मन में है, लेकिन उसके साथ एक और भाव चाहिए। इतना परिश्रम करके, इतना त्याग बलिदान देकर यह जो स्वतंत्रता हमको मिली है, उस स्वतंत्रता को कायम रखना।
संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने वीर सावरकर के शब्दों को याद करते हुए कहा कि, "जे जे उत्तम उदात्त उन्नत महन मधुर ते ते, स्वतंत्रते सत भगवती सर्वतव सहचारी होते।" इसका अर्थ बताते हुए सरसंघचालक ने कहा कि स्वतंत्रता का परिणाम यह है कि जो उत्तम, उदात्त, उन्नत और मधुर है, वह सब कुछ हमारे देश में अवतरित हो। इसकी आवश्यकता को पूरा करने का दायित्व भी हमारा बनता है।
संघ प्रमुख ने राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जब हम तिरंगे का ध्वजारोहण करते हैं तो उसके रंगों को देखकर हमें यही संदेश मिलता है।
केसरिया रंग कर्मशीलता, ज्ञान और त्याग का प्रतीक: मोहन भागवत ने कहा कि जिस प्रकार के परिश्रम से एक राष्ट्र को स्वतंत्रता मिलती है और स्वतंत्रता के बाद वह वैभव संपन्न और सुरक्षित बनता है, उस त्याग और बलिदान की आवश्यकता की याद दिलाने वाला यह केसरिया रंग है।
सफेद रंग निर्मलता और शांति का प्रतीक: संघ प्रमुख ने कहा कि जीवन में त्याग, बलिदान, कर्मशीलता और ज्ञान रहने से समाज में शांति रहती है और चित्त निर्मल बनते हैं। सफेद रंग हमें इस तपस्या को करने और यह जांचते रहने के लिए प्रेरित करता है कि हमारी तपस्या ठीक चल रही है या नहीं।
हरा रंग समृद्धि का प्रतीक: भागवत ने कहा कि त्याग और निर्मलता का परिणाम ही समृद्धि है। तिरंगे के बीच बने अशोक चक्र का जिक्र करते हुए संघ प्रमुख ने कहा कि हम व्यक्ति के रूप में अलग-अलग हैं, इसलिए विचार भी अलग-अलग होंगे, लेकिन यह विविधता ही एकता की अभिव्यक्ति है।
अशोक चक्र (धर्मचक्र): मोहन भागवत ने उदाहरण दिया कि चक्र के आरे इतने सारे हैं, लेकिन वह एक ही केंद्र से बाहर निकल रहे हैं और उस चक्र को उसका भान है, उस समाज को उसका भान है। इसलिए अपने अलग-अलग जाने वाले तीक्ष्ण आरों को उसने एक धर्म की मर्यादा के अंदर रखा है।
उन्होंने कहा कि समाज के ठीक से चलने के लिए जो अनुशासन जरूरी है, उसी की मर्यादा में रहकर हमें आगे बढ़ना है। इसलिए केंद्र में धर्मचक्र को हमारे राष्ट्रीय ध्वज पर स्थान दिया गया है।
मोहन भागवत ने देश के सामने मौजूद कर्तव्य का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि राष्ट्र अपना स्वतंत्र तो हो गया, स्वतंत्र रहेगा यह बात पक्की है। परंतु उस राष्ट्र को सुखी, संपन्न, सुरक्षित बनाना है। विश्व में अपना नियत योगदान करने वाला राष्ट्र बनाना है।
उन्होंने कहा कि इस रास्ते में बहुत सारी आपत्तियां और बहुत सारे उल्टे चलने वाले लोग हैं लेकिन हमारे तत्व से अलग न होते हुए, संपूर्ण दुनिया में इन सारी बातों का सामना करते हुए हमको भारत को एक विश्वगुरु राष्ट्र बनाना है। संपूर्ण मानवता के जीवन में अपना सार्थक योगदान करने वाला देश बनाना है। यह कर्तव्य हमारे सामने आज है। इसका हम चिंतन करें।
संघ प्रमुख ने कहा कि राष्ट्रीय ध्वज का ध्वजारोहण करते समय हमें इन सारे प्रतीकों के पीछे जो विचार हैं, उनका चिंतन करना चाहिए। उस चिंतन से जो सार मिलता है, उसे अपने जीवन में उतारने की बहुत आवश्यकता है।