Nagpur High Court Hearing LPG Distributors: नागपुर महाराष्ट्र के एलपीजी डिस्ट्रीब्यूटर्स एसोसिएशन ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए गैस कंपनियों द्वारा लागू किए गए 100% डिजिटल बुकिंग और डिलीवरी ऑथेंटिकेशन कोड (डीएसी) के नियम को चुनौती दी। याचिका पर गुरुवार को सुनवाई के बाद न्यायाधीश अनिल किलोर और न्यायाधीश राज वाकोडे ने याचिकाकर्ता द्वारा दिए गए आवेदन पर 3 सप्ताह में निर्णय लेने के कम्पनियों को आदेश दिए, साथ ही याचिका का निपटारा कर दिया।
विशेषतः राज्य भर में फैले एलपीजी वितरकों के एलपीजी डिस्ट्रीब्यूटर्स एसोसिएशन को उसी समय निराशा हाथ लगी थी, जब अदालत ने 100% डिजिटल बुकिंग और डिलीवरी ऑथेंटिकेशन कोड (डीएसी) की अनिवार्यता के खिलाफ दायर उनकी याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया था।
महाराष्ट्र के एलपीजी डिस्ट्रीब्यूटर्स एसोसिएशन ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए गैस कंपनियों द्वारा लागू किए गए 100% डिजिटल बुकिंग और डिलीवरी ऑथेंटिकेशन कोड (डीएसी) के नियम को चुनौती दी थी। वितरकों की दलील थी कि 100% डिजिटल बुकिंग पूरी तरह से उनके नियंत्रण में नहीं है।
इसके अलावा, डिलीवरी कोड पूरी तरह से सॉफ्टवेयर और नेटवर्क पर निर्भर करता है। यदि नेटवर्क में कोई तकनीकी खराबी आती है या ग्राहक किसी कारण से कोड नहीं दे पाते हैं, तो वितरक ग्राहकों को गैस सिलेंडर की आपूर्ति नहीं कर सकते। वितरकों ने यह भी बताया कि उन्हें ये निर्देश केवल वॉट्सएप संदेशों के माध्यम से दिए गए थे।
सुनवाई के दौरान अदालत ने कड़ा रुख अपनाते हुए याचिकाकर्ता एलपीजी डिस्ट्रीब्यूटर्स एसोसिएशन को सीधे अदालत आने पर फटकार लगाई थी। कोर्ट ने हैरानी जताते हुए सवाल किया था कि वितरकों ने इस समस्या के संबंध में पहले संबंधित अधिकारियों या विभाग को कोई लिखित ज्ञापन क्यों नहीं दिया।
यह भी पढ़ें:-कामठी-नागपुर हाईवे पर स्क्रैप वाहनों के गोदाम में भीषण आग, दमकल ने घंटों मशक्कत के बाद आग पर पाया काबू
अदालत का कहना था कि बिना किसी पूर्व लिखित शिकायत या सरकारी माध्यम से बातचीत किए सीधे हाई कोर्ट में याचिका दायर करना उचित प्रक्रिया नहीं है। इसके साथ ही अदालत ने वॉट्सएप पर दिए गए निर्देशों की प्रामाणिकता पर भी सवाल उठाए और कहा कि ऐसे निर्देशों के लिए कोई आधिकारिक अधिसूचना या सर्कुलर होना चाहिए, ताकि यह पता चल सके कि आदेश किसी उच्च अधिकारी की ओर से है या नहीं। अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिका के साथ ऐसा एक भी दस्तावेज संलग्न नहीं है जो यह साबित करे कि वितरकों ने पहले प्रशासन से गुहार लगाई थी।