नागपुर हाई कोर्ट अनुसूचित जाति सोर्स: AI डिजाइन फोटो
नागपुर

नागपुर हाईकोर्ट का फैसला: इस्लाम मानने वालों को नहीं मिल सकता SC का दर्जा; संविधान आदेश 1950 को ठहराया वैध

Nagpur High Court: नागपुर हाई कोर्ट ने कहा कि संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के अनुसार हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के अलावा अन्य धर्म मानने वालों को अनुसूचित जाति का दर्जा नहीं मिल सकता।

अंकिता पटेल

Scheduled Caste Eligibility Ruling: नागपुर हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि इस्लाम धर्म मानने वाले व्यक्तियों को अनुसूचित जाति का दर्जा नहीं दिया जा सकता। अदालत ने अपने फैसले में संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के पैरा 3 की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा है।

यह आदेश स्पष्ट रूप से प्रावधान करता है कि हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को मानने वाले व्यक्ति को अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाएगा।

रक्षा सेवा, अंबाझरी में वरिष्ठ लेखा परीक्षक के पद पर कार्यरत रहे मो. फहीम ने हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की। फहीम ने 'बहाना' जाति से होने का दावा किया था जो 1950 के आदेश के तहत अनुसूचित जाति की सूची (एंट्री नंबर 5) में दर्ज है।

संवैधानिक आदेश को दी गई चुनौती

हालांकि 24 नवंबर 1998 को नागपुर की जाति प्रमाणपत्र जांच समिति ने उनका दावा यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि वे जन्म से मुस्लिम हैं और स्कूल के रिकॉर्ड में उन्हें 'मुस्लिम-बहाना' दर्ज किया गया है। जांच समिति ने अपने आदेश में कहा था कि अनुसूचित जाति का आदेश केवल हिंदुओं, सिखों और बौद्धों पर लागू होता है, इसलिए याचिकाकर्ता का दावा कानूनन मान्य नहीं है।

जाति प्रमाणपत्र रद्द होने के बाद याचिकाकर्ता ने जांच समिति के 1998 के आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी, साथ ही 1950 के संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश के पैरा 3 की संवैधानिकता पर भी सवाल उठाया। याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क यह था कि मुसलमानों को अनुसूचित जाति के लाभ से बाहर रखना भेदभावपूर्ण है और यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16 और 25 का सीधा उल्लंघन है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले और 'अनुच्छेद 141' का हवाला

न्यायाधीश उर्मिला जोशी फाल्के और न्यायाधीश निवेदिता मेहता ने इस मामले पर विस्तार से सुनवाई की। कोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के 1985 के प्रसिद्ध 'सुसाई बनाम भारत संघ' मामले का हवाला दिया जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने 1950 के आदेश के पैरा 3 की संवैधानिक वैधता को सही ठहराया था।

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत सुप्रीम कोर्ट द्वारा घोषित कानून देश की सभी अदालतों पर बाध्यकारी है। न्यायिक अनुशासन के तहत हाई कोर्ट सुप्रीम कोर्ट के स्थापित कानून की अनदेखी नहीं कर सकता या उस पर सवाल नहीं उठा सकता।

सुप्रीम कोर्ट में लंबित पड़े मामले का प्रभाव नहीं

सुनवाई के दौरान यह बात भी सामने आई कि अनुसूचित जाति के आदेश में मुसलमानों और ईसाइयों को शामिल न करने का यह बड़ा संवैधानिक मुद्दा वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट की एक बड़ी बेंच के समक्ष विचारार्थ लंबित है।

याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका को सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर करने की भी मांग की थी लेकिन 20 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया था और हाई कोर्ट को ही मामले को 4 महीने के भीतर प्राथमिकता के आधार पर निपटाने का निर्देश दिया था।

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट में किसी समान मामले का लंबित होना मौजूदा बाध्यकारी कानून के प्रभाव को कम नहीं करता। जब तक सुप्रीम कोर्ट अपना पुराना फैसला नहीं बदलता तब तक अदालतें पुराने फैसले का पालन करने के लिए बाध्य हैं।

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