Railway Bio-Toilet Smell Solution: ट्रेन में सफर के दौरान बायो-टॉयलेट से आने वाली तीखी दुर्गंध जल्द ही बीती बात होने वाली है। पश्चिम रेलवे ने यात्रियों और अपने ऑन-बोर्ड स्टाफ की लंबे समय से चली आ रही इस परेशानी को दूर करने के लिए एक क्रांतिकारी कदम उठाया है। मुंबई के लोअर परेल वर्कशॉप में 3 लाख लीटर क्षमता वाला एक अत्याधुनिक एनेरोबिक माइक्रोबियल (बैक्टीरिया) प्लांट स्थापित किया जा रहा है।
अक्सर मेल और एक्सप्रेस ट्रेनों के कोच अटेंडेंट, टीटीई और अन्य कर्मचारियों को यात्रियों की नाराजगी झेलनी पड़ती थी। बायो-टॉयलेट के ठीक से काम न करने या बैक्टीरिया की कमी के कारण कोच में फैलने वाली बदबू सफर का मजा किरकिरा कर देती थी। खासकर जब ट्रेन किसी स्टेशन पर रुकती थी या रिहायशी इलाकों से गुजरती थी, तो यह समस्या और भी गंभीर हो जाती थी। इस बदबू के कारण कई बार यात्रियों और स्टाफ के बीच तीखी बहस भी देखने को मिलती थी।
रेलवे अधिकारियों के मुताबिक, इन बायो-डाइजेस्टर टैंकों में इस्तेमाल होने वाले विशेष बैक्टीरिया DRDO (रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन) द्वारा विकसित किए गए हैं। यह बैक्टीरिया मानवीय अपशिष्ट (Human Waste) को कुछ ही घंटों के भीतर पानी और मिथेन जैसी गैसों में तब्दील कर देते हैं। नया प्लांट लगने से रेलवे के पास हमेशा उच्च गुणवत्ता वाले बैक्टीरिया का स्टॉक मौजूद रहेगा।
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अभी तक बैक्टीरिया की आपूर्ति बाहरी स्रोतों पर निर्भर थी, जिससे कभी-कभी गुणवत्ता या समय पर उपलब्धता में कमी आ जाती थी। लोअर परेल में बने इस विशाल प्लांट के जरिए ट्रेनों के मेंटेनेंस के दौरान तुरंत फ्रेश बैक्टीरिया कल्चर डाला जा सकेगा। बैक्टीरिया की सही मात्रा टैंक में रहने से अपशिष्ट का अपघटन (Decomposition) तेजी से होगा। ऑन-बोर्ड स्टाफ को अब बदबू संबंधी शिकायतों और यात्रियों के गुस्से का सामना नहीं करना पड़ेगा। यह पहल न केवल 'स्वच्छ भारत अभियान' को मजबूती देगी, बल्कि भारतीय रेल के सफर को अंतरराष्ट्रीय मानकों के करीब ले जाएगी।