Kapil Sibal Supreme Court Shiv Sena: शिवसेना के नाम और धनुष-बाण चुनाव चिन्ह विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान उद्धव ठाकरे गुट (UBT) की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने केंद्रीय चुनाव आयोग (ECI) के फैसले और एकनाथ शिंदे गुट के कानूनी रुख पर तीखा हमला बोला है।
कपिल सिब्बल ने शीर्ष अदालत में तर्क दिया कि यदि शिंदे समूह का यह दावा सही है कि शिवसेना का 2018 का पार्टी संविधान अलोकतांत्रिक था, तो उसी संविधान के तहत मिले उनके विधायक और मंत्री पद भी स्वतः अलोकतांत्रिक हो जाते हैं।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ के समक्ष दलील रखते हुए कपिल सिब्बल ने कहा कि चुनाव आयोग ने एकनाथ शिंदे गुट को पार्टी नाम और चिन्ह आवंटित करते समय यह तर्क स्वीकार किया था कि 2018 में पार्टी संविधान में किए गए संशोधन लोकतांत्रिक सिद्धांतों के विपरीत थे।
सिब्बल ने सवाल उठाया कि शिंदे गुट के जिन नेताओं ने 2018 के संविधान को असंवैधानिक या अलोकतांत्रिक बताया, उनकी खुद की नियुक्तियां और पदोन्नतियां भी उसी 2018 के संविधान के तहत हुई थीं। उन्होंने तर्क दिया कि जिस नियम या अधिनियम का लाभ उठाकर वे पदों पर पहुंचे, उसे बाद में अपनी सहूलियत के हिसाब से अलोकतांत्रिक करार देकर चुनाव चिन्ह पर दावा नहीं किया जा सकता।
कपिल सिब्बल ने अदालत से कहा कि यदि एक पल के लिए यह मान भी लिया जाए कि पार्टी का आंतरिक संविधान अलोकतांत्रिक या अपर्याप्त था, तो इसका अधिकतम विधिक परिणाम पार्टी का पंजीकरण रद्द होना हो सकता है, न कि मूल पार्टी का चुनाव चिन्ह छीनकर किसी दूसरे धड़े को सौंप देना।
उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग ने इस मामले में वैधानिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया और मूल राजनीतिक दल को पर्याप्त सूचना व पक्ष रखने का अवसर दिए बिना ही एकतरफा रुख अपनाया।
सिब्बल ने अदालत में यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि 'राजनीतिक दल' (Political Party) और 'विधायक दल' (Legislative Party) दो अलग-अलग इकाइयां नहीं हैं। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग ने केवल विधायक दल में बहुमत के आंकड़ों के आधार पर फैसला सुनाया, जबकि मूल संगठन यानी राजनीतिक दल में कोई वास्तविक विभाजन नहीं हुआ था। सिब्बल ने दावा किया कि विधायक दल में दो गुट बनने को मूल राजनीतिक दल का विभाजन नहीं माना जा सकता और ऐसे में एक-तिहाई का नियम लागू नहीं होता।