Kapil Sibal Supreme Court: महाराष्ट्र की राजनीति का अखाड़ा एक बार फिर देश की सर्वोच्च अदालत में सज चुका है। शिवसेना में हुई ऐतिहासिक फूट और उसके बाद के घटनाक्रमों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान उद्धव ठाकरे गुट के वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने तीखे तेवर अपनाए।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने सिब्बल ने जो तर्क दिए, उन्होंने पूरी राजनीतिक और कानूनी गलियारों में हलचल मचा दी है। सिब्बल ने सीधे तौर पर आरोप लगाया कि शिवसेना को तोड़ने के लिए केंद्रीय जांच एजेंसियों का हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया।
कपिल सिब्बल ने कोर्ट में जोरदार दलील देते हुए कहा कि जब शिवसेना में फूट पड़ रही थी, तब कई विधायकों को ईडी और सीबीआई की नोटिसें थमाई गई थीं। सिब्बल का सबसे बड़ा युक्तिवाद यह था कि इन जांच एजेंसियों की कार्रवाई ने विधायकों पर दबाव बनाया, जिससे राज्य की राजनीतिक स्थिति पूरी तरह प्रभावित हुई। उन्होंने कोर्ट को बताया कि इन नोटिसों ने बागी गुट की 'मदद' की और इसी दबाव के चलते पूरी पार्टी को दोफाड़ करने में सफलता मिली।
अयोग्यता की याचिकाओं पर चर्चा करते हुए सिब्बल ने विधानसभा अध्यक्ष की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि अध्यक्ष ने लंबे समय तक अयोग्यता की याचिकाओं पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। सिब्बल ने अदालत का ध्यान इस ओर दिलाया कि 2023 में नोटिस जारी होने और जवाब मिलने के बावजूद अध्यक्ष चुप बैठे रहे।
उन्होंने आरोप लगाया कि जानबूझकर तब तक इंतजार किया गया जब तक कि शिंदे गुट के पास दो-तिहाई बहुमत न हो जाए। उन्होंने स्पष्ट किया कि विधानसभा अध्यक्ष एक ट्रिब्यूनल के रूप में कार्य करते हैं और सुप्रीम कोर्ट उन्हें निर्देश देने का पूरा अधिकार रखता है।
कपिल सिब्बल ने अपने युक्तिवाद का समापन करते हुए कहा कि यह केवल एक पार्टी के चिह्न या अयोग्यता का सवाल नहीं है, बल्कि यह देश के संविधान और लोकतंत्र के भविष्य का सवाल है। उन्होंने मांग की कि चुनाव आयोग और विधानसभा अध्यक्ष के गलत निर्णयों पर कोर्ट को एक ऐतिहासिक फैसला देना चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का दुरुपयोग न हो सके। सिब्बल ने इस दौरान एसआर बोम्मई केस का भी हवाला देते हुए आयोग के फैसले को पूरी तरह गलत करार दिया।