Sanjay Raut On Delimitation Bill: संसद के आगामी मॉनसून सत्र से पहले देश की राजनीति में एक बड़ा नीतिगत और रणनीतिक मोड़ देखने को मिल रहा है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (SP) के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद पवार द्वारा लोकसभा परिसीमन बिल (131वां संविधान संशोधन विधेयक, 2026) को समर्थन देने के स्पष्ट संकेत मिलने के बाद विपक्षी खेमे में भारी खलबली मच गई है।
शरद पवार की अगुवाई वाली पार्टी के इस नरम रुख के सामने अब तक कड़ा विरोध कर रही उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) भी नतमस्तक होती दिखाई दे रही है। पार्टी के फायरब्रांड नेता और राज्यसभा सांसद संजय राउत के सुर इस मुद्दे पर अचानक बदल गए हैं। राउत ने अब नरम लहजे में कहा है कि अभी तक यह तय नहीं हुआ है कि यह बिल संसद के पटल पर आएगा या नहीं, लेकिन जब यह विधेयक सदन में पेश होगा, तब सभी विपक्षी दल एक साथ बैठकर इस पर अंतिम फैसला करेंगे।
विपक्षी दलों के बीच इस विषय पर मची खींचतान का मुख्य कारण सरकार द्वारा इस महत्वपूर्ण कानून को दोबारा संसद में पारित कराने की तैयारी है। दरअसल, इसी साल अप्रैल 2026 में आवश्यक दो-तिहाई बहुमत की कमी के चलते यह ऐतिहासिक विधेयक लोकसभा में खारिज हो गया था। हालांकि, केंद्र की एनडीए सरकार इसे आगामी सत्र में दोबारा पेश करने की पूरी तैयारी कर चुकी है।
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यदि संसद के दोनों सदनों से यह बिल पास हो जाता है, तो देश में लोकसभा सीटों की कुल संख्या वर्तमान 543 से बढ़कर लगभग 850 हो जाएगी। सत्तापक्ष का लगातार यह तर्क रहा है कि साल 2029 के आम चुनावों में महिलाओं को संसद में 33 प्रतिशत आरक्षण का वास्तविक लाभ देने के लिए सीटों का विस्तार और नए सिरे से परिसीमन करना अत्यंत आवश्यक है। इस संख्याबल को मजबूत करने के लिए भाजपा लगातार प्रयास कर रही है, जिसमें शिवसेना (UBT) के कुछ पूर्व सांसदों का पाला बदलना भी अहम कड़ी माना जा रहा है।
इस वैचारिक मतभेद के बीच शिवसेना (UBT) की नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर अपनी व्यक्तिगत राय साझा करते हुए इस प्रक्रिया का खुला समर्थन किया है। उन्होंने लिखा कि वे हमेशा से एक ऐसे परिसीमन के पक्ष में रही हैं जो सच में जनता की ताकत और उनके प्रतिनिधित्व को बढ़ाए। उन्होंने याद दिलाया कि 2023 के नारी शक्ति अधिनियम के तहत आरक्षण लागू करने से पहले जनगणना और परिसीमन अनिवार्य प्रक्रियाएं हैं, इसलिए राजनीतिक दलों को अपने पुराने रुख पर पुनर्विचार करना चाहिए।
दूसरी तरफ, सुप्रिया सुले ने समर्थन के लिए एक बड़ी शर्त सामने रखी है। विपक्षी दलों की मांग है कि विधेयक में यह पूरी तरह स्पष्ट होना चाहिए कि सभी राज्यों की सीटों में समान रूप से 50 प्रतिशत की आनुपातिक बढ़ोतरी होगी, ताकि किसी भी राज्य के साथ अन्याय न हो। संजय राउत ने भी संकेत दिए हैं कि यदि सरकार उनके इन संशोधनों को स्वीकार कर लेती है, तो विपक्ष सकारात्मक रूप से बिल का समर्थन करने पर विचार कर सकता है। हालांकि, कांग्रेस अब भी बिल के पुरजोर विरोध के अपने पुराने स्टैंड पर पूरी तरह कायम है।