Hybrid School Mode Online Class Demand: महाराष्ट्र में नया शैक्षणिक सत्र शुरू होने में अब महज कुछ ही दिन शेष रह गए हैं, लेकिन ईंधन की बढ़ती कीमतों ने स्कूल परिवहन व्यवस्था के सामने एक गंभीर आर्थिक संकट खड़ा कर दिया है। स्कूल बस ओनर्स एसोसिएशन (SBOA) के अनुसार, बस संचालक पहले से ही भारी वाहन रखरखाव (Maintenance), बढ़े हुए बीमा प्रीमियम, आरटीओ परमिट शुल्क, प्रशासनिक खर्च और चालकों व क्लीनर के वेतन का भारी बोझ उठा रहे हैं। अब डीजल की कीमतों में लगी आग ने उनके मुनाफे को पूरी तरह खत्म कर दिया है, जिससे वे कोविड-19 काल जैसी बदहाली का सामना कर रहे हैं।
एसोसिएशन ने स्पष्ट किया है कि वे इस मंदी का अतिरिक्त आर्थिक बोझ सीधे तौर पर अभिभावकों और विद्यार्थियों पर नहीं डालना चाहते। यही वजह है कि बिना बस शुल्क बढ़ाए खर्च को नियंत्रित करने के लिए SBOA और पेरेंट्स एसोसिएशन ने संयुक्त रूप से सरकार के सामने कुछ बेहद महत्वपूर्ण तकनीकी और व्यावहारिक रास्ते सुझाए हैं।
संगठन का सबसे बड़ा सुझाव यह है कि स्कूलों को पूरी तरह ऑफलाइन चलाने के बजाय हाइब्रिड मॉडल पर स्थानांतरित किया जाए। इसके तहत सप्ताह में तीन दिन फिजिकल (ऑफलाइन) क्लास और दो दिन ऑनलाइन क्लास आयोजित की जानी चाहिए। संगठन का गणित कहता है कि महाराष्ट्र में दौड़ने वाली लगभग 40 हजार स्कूल बसें हर दिन औसतन 18 से 20 लीटर डीजल की खपत करती हैं। यदि स्कूल दो दिन ऑनलाइन चलते हैं, तो इससे बसों का रोजाना संचालन बंद रहेगा और राज्यभर में लगभग 16 लाख लीटर कीमती डीजल बचाया जा सकेगा, जिससे ऑपरेटरों की लागत में भारी गिरावट आएगी।
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प्रधानमंत्री द्वारा ईंधन बचाने की हालिया अपीलों और बढ़ती महंगाई को देखते हुए 'इंडिया वाइड पेरेंट्स एसोसिएशन' भी इस अभियान के समर्थन में उतर आया है। पेरेंट्स एसोसिएशन ने एक लिखित पत्र के जरिए शिक्षा और परिवहन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को कुछ औपचारिक सुझाव सौंपे हैं, जो इस प्रकार हैं:
स्कूलों में पढ़ाई हाइब्रिड मोड में हो, जिसमें हफ्ते में दो दिन ऑनलाइन कक्षा और बाकी दिन ऑफलाइन कक्षाएं संचालित की जाएं। जिन छात्रों के घर स्कूल के पास (1-2 किलोमीटर के दायरे में) हैं, उन्हें प्रदूषण और ईंधन बचाने के लिए पैदल या साइकिल से स्कूल आने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। सरकार को स्कूल बस ऑपरेटरों को तत्काल राहत पैकेज देना चाहिए या उन्हें रियायती दरों पर इलेक्ट्रिक (EV) बसें उपलब्ध कराने में वित्तीय मदद करनी चाहिए। अब देखना होगा कि 1 जून से पहले महाराष्ट्र का शिक्षा और परिवहन विभाग इन पर्यावरण-अनुकूल और आर्थिक रूप से व्यावहारिक सुझावों पर क्या नीतिगत फैसला लेता है।