Supreme Court Shiv Sena Symbol Dispute: शिवसेना के नाम और चुनाव चिन्ह पर अधिकार को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई पर सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को भी सुनवाई हुई। इस दौरान जस्टिस बागची की टिप्पणी ने एकनाथ शिंदे गुट की ओर से पेश दलीलों को लेकर महत्वपूर्ण सवाल खड़ा किया।
अदालत ने सवाल उठाया कि यदि किसी राजनीतिक दल में दल-बदल की स्थिति बनती है, तो क्या ऐसे मामले में पार्टी के चुनाव चिन्ह का अधिकार दल बदलने वाले गुट को दिया जा सकता है?
सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने सवाल किया कि पार्टी के चुनाव चिन्ह का महत्व उन लोगों के लिए किस तरह तय किया जाना चाहिए,
जिन पर संवैधानिक प्रावधानों के उल्लंघन का आरोप है, और उन लोगों के लिए क्या स्थिति होगी जिन्होंने ऐसे कथित उल्लंघन के खिलाफ शिकायत की है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अभी यह निष्कर्ष नहीं दिया है कि इस मामले में किस गुट ने संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन किया है।
एकनाथ शिंदे गुट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज कौल ने अदालत के सामने कहा कि यदि चुनाव चिन्ह का फैसला उनके पक्ष में नहीं भी आता है, तो इसका मतलब स्वत: अयोग्यता नहीं होगा। उनके अनुसार, चुनाव चिन्ह उस गुट को मिलना चाहिए जो खुद को वास्तविक राजनीतिक दल के रूप में स्थापित करने में सक्षम हो।
कौल ने यह भी दलील दी कि यदि दोनों में से कोई भी गुट वास्तविक राजनीतिक दल होने का दावा साबित नहीं कर पाता है, तो ऐसी स्थिति में अलग कानूनी परिस्थिति पैदा होगी। उन्होंने शिवसेना में विभाजन के बाद उद्धव ठाकरे के फ्लोर टेस्ट में नहीं जाने और मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने का भी उल्लेख किया।
शिंदे गुट ने चुनाव आयोग के उस फैसले का बचाव किया, जिसमें विधायी बहुमत को राजनीतिक दल की पहचान तय करने का आधार माना गया था। नीरज कौल ने कहा कि चुनाव चिन्ह (आरक्षण और आवंटन) आदेश के तहत विधायी बहुमत की कसौटी प्रासंगिक और कानूनी रूप से मान्य है।
उन्होंने दलील दी कि राजनीतिक दल की पहचान निर्धारित करने के लिए विधायी बहुमत को आधार बनाने पर कोई पूर्ण कानूनी रोक नहीं है। शिंदे गुट ने सुप्रीम कोर्ट के सुभाष देसाई मामले में दिए गए फैसले का हवाला देते हुए कहा कि उस निर्णय में विधायी बहुमत की कसौटी के इस्तेमाल पर रोक नहीं लगाई गई थी।
शिवसेना के नाम और चुनाव चिन्ह से जुड़ा विवाद महाराष्ट्र की राजनीति में लंबे समय से महत्वपूर्ण कानूनी मुद्दा बना हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों की दलीलों और संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या पर चर्चा जारी है। फिलहाल अदालत ने यह तय नहीं किया है कि चुनाव चिन्ह से जुड़े विवाद में अंतिम कानूनी स्थिति क्या होगी।