National Executive List Controversy: महाराष्ट्र की राजनीति में चर्चा थी कि अजित पवार ने पवार परिवार की छाया से बाहर निकलने के लिए अपनी अलग राह चुनी थी, लेकिन उनकी पार्टी की नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की सूची ने कुछ और ही कहानी बयां कर दी है। पहले प्रफुल्ल पटेल, सुनील तटकरे और छगन भुजबल जैसे दिग्गजों का नाम सूची से गायब होना और फिर भारी विवाद के बाद उनकी वापसी होना, यह महज लिपिकीय भूल नहीं बल्कि एक गहरे राजनीतिक ड्रामे का हिस्सा लग रहा है। पार्टी के भीतर अब दबी जुबान में एक ही सवाल पूछा जा रहा है कि क्या अब यहाँ भी सिर्फ पवार सरनेम ही पावरफुल रहेगा?
इस नई सूची में पूरी तरह से पवार परिवार का दबदबा नजर आ रहा है। नई कार्यकारिणी का स्वरूप कुछ इस प्रकार है-
कुल 13 पदाधिकारियों की इस फेरबदल वाली सूची ने यह साफ कर दिया है कि पार्टी की कमान अब पूरी तरह से अजीत पवार के परिवार के हाथों में सिमट गई है। युवा नेताओं में सना मलिक, अविनाश आदिक और धीरज शर्मा जैसे नामों को भी सचिव पद की जिम्मेदारी दी गई है।
सबसे ज्यादा हैरानी प्रफुल्ल पटेल के नाम को लेकर है, जो दशकों से पार्टी का राष्ट्रीय चेहरा रहे हैं। वहीं, महाराष्ट्र प्रदेश अध्यक्ष और लोकसभा सांसद सुनील तटकरे का नाम महासचिव पद से हटना पार्टी के भीतर मची कलह का संकेत दे रहा है। छगन भुजबल जैसे कद्दावर ओबीसी नेता और हसन मुश्रीफ जैसे मंत्रियों को जगह न मिलना, पार्टी के भीतर एक नए आंतरिक युद्ध (Civil War) की शुरुआत मानी जा रही है।
विवाद और नाराजगी की खबरें जैसे ही शीर्ष नेतृत्व तक पहुँची, राष्ट्रीय अध्यक्ष सुनेत्रा पवार ने डैमेज कंट्रोल की कोशिश शुरू कर दी। उन्होंने देर रात सोशल मीडिया (X) पर सफाई देते हुए कहा, मीडिया में प्रसारित हो रही पदाधिकारियों की सूची में एक क्लरिकल मिस्टेक हुई है, जिसे जल्द ही सुधार लिया जाएगा।
सुनेत्रा पवार द्वारा जारी की गई सुधरी हुई सूची में दिग्गजों के नाम तो वापस आ गए, लेकिन उनके कद को छोटा कर दिया गया है। नई सूची में उन्हें अब पार्टी का राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नहीं, बल्कि सिर्फ राज्यसभा में नेता बताया गया है। सुनील तटकरे को भी केवल लोकसभा में नेता के तौर पर दिखाया गया है। दूसरी ओर, अजित पवार के दोनों बेटों को कार्यकारिणी में महत्वपूर्ण स्थान देकर यह साफ कर दिया गया है कि भविष्य का रिमोट कंट्रोल किसके हाथ में होगा।
खबरों की मानें तो पार्थ पवार अब पार्टी पर अपनी पकड़ मजबूत करने में जुट गए हैं। वे पटेल और तटकरे जैसे पुराने दिग्गजों के वर्चस्व को कम करना चाहते हैं। लेकिन असली विवाद की जड़ है विलीनीकरण (Merger)। सूत्रों के अनुसार, पवार परिवार अब फिर से एक होने के संकेत दे रहे हैं। पवार परिवार चाहता है कि दोनों राष्ट्रवादी गुटों का विलय हो जाए। लेकिन प्रफुल्ल पटेल और सुनील तटकरे इस विलय के सख्त खिलाफ हैं। उन्हें डर है कि अगर शरद पवार के साथ फिर से गठबंधन हुआ, तो उनकी स्थिति गौण हो जाएगी।
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अगर विलीनीकरण का दबाव बढ़ा और पुराने नेताओं को दरकिनार किया गया, तो पार्टी में एक और फूट तय मानी जा रही है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा गर्म है कि यदि पटेल, तटकरे और भुजबल को पार्टी में सम्मानजनक स्थान नहीं मिला, तो वे भारतीय जनता पार्टी (BJP) का दामन थाम सकते हैं। ऐसे में अजित पवार गुट का भविष्य अधर में लटकता नजर आ रहा है। इस पूरे ड्रामे में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होगी। क्या बीजेपी इन नाराज दिग्गजों को अपने साथ लेगी? या फिर पवार परिवार का पुनर्मिलन महाराष्ट्र की राजनीति का नया समीकरण लिखेगा?