Mumbai Skin Donation Shortage: मुंबई में स्किन डोनेशन (त्वचा दान) की गंभी कमी ने बर्न इंजरी यानी आग से झुलसे मरीजों के उपचार को एक बड़े संकट में डाल दिया है।
नेशनल बर्न्स सेंटर द्वारा जारी हालिया आंकड़ों के अनुसार, शहर में हर साल त्वचा की जितनी आवश्यकता होती है, उसका महज 25 प्रतिशत हिस्सा ही दान के माध्यम से मिल पा रहा है।
इस भारी कमी के कारण कई मरीज को समय पर स्किन ट्रांसप्लांट नहीं मिल पाता है, जो अंततः उनक मृत्यु का कारण बन जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आपूर्ति और मांग के इस अंतर को कम नहीं किया गया, तो गंभीर रूप से झुलसे मरीजों को बचाना चुनौतीपूर्ण बना रहेगा। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, किसी व्यक्ति किसी अन्य मरीज के लिए जीवनदान साबित हो सकता है।
नेशनल बर्स सेंटर के डायरेक्ट सर्जन डॉ सुनील केशवानी ने बताया कि जागरूकता की कम इस दिशा में सबसे बड़ी बाधा है। चौंकाने वाली बात यह है कि 10 में से केवल एक व्यक्ति को ही स्किन डोनेशन की सही प्रक्रिया की जानकारी होती है। आंकड़ों के अनुसार, झुलसने वाले करीब 70 प्रतिशत मरीज 15 से 35 वर्ष की युवा आयु वर्ग के होते हैं ऐसे में समय पर स्किन ग्राफ्टिंग न केवल उनकी जान बचाती है बल्कि उन्हें एक सामान्य जीवन जीने में भी मदद करती है।
नेशनल बर्न्स सेंटर ने अब जागरूकता अभियानों की गति तेज कर दी है। सेंटर द्वारा हर साल लगभग 300 अभियान चलाए जा रहे हैं ताकि लोगों को इस मानवीय पहल से जोड़ा जा सके।
इस मुहिम में रोटरी क्लब, जेडटीसीसी और रोटो जैसे कई प्रमुख सामाजिक संगठन भी शामिल हुए है। बर्न सर्वाइवर विराज ठाकुर, जो स्वयं 43 प्रतिशत झुलसने के बाद स्किन डोनेशन की मदद से स्वस्थ हुए हैं, आज इस अभियान का एक बड़ा चेहरा बनकर लोगों को प्रेरित कर रहे हैं। समाज की सक्रिय भागीदारी ही बर्न मरीजों के जीवन में नई उम्मीद की किरण ला सकती है।