महाराष्ट्र की राजनीति में लगातार दो दिनों से राजनीतिक सरगर्मी काफी तेज हो गई है।
फडणवीस और ठाकरे बंधुओं के बाद राउत और आशीष शेलार एक मंच पर आए।
नेताओं का इस तरह सार्वजनिक रूप से साथ आना सियासी गलियारों में चर्चा का विषय है।
Maharashtra Politics Sanjay Raut And Ashish Shelar Together: महाराष्ट्र के सियासी गलियारों में इन दिनों हलचल बेहद तेज है और राजनीतिक सरगर्मियां अपने चरम पर पहुंच गई हैं। कल तक एक-दूसरे पर तीखे राजनीतिक हमले करने वाले कट्टर प्रतिद्वंद्वी नेता अचानक एक के बाद एक सार्वजनिक कार्यक्रमों में मंच साझा करते हुए नजर आ रहे हैं।
गुरुवार को मुंबई में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और ठाकरे भाइयों के एक ही मंच पर दिखाई देने के बाद, शुक्रवार को एक और चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई। केंद्र व राज्य सरकार और भारतीय जनता पार्टी पर लगातार तीखे हमले करने वाले उद्धव सेना के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राज्यसभा सांसद संजय राउत और भाजपा नेता व मंत्री आशीष शेलार एक साथ एक ही मंच पर बैठे दिखाई दिए।
शुक्रवार को मुंबई के बांद्रा पूर्व स्थित आईईएस न्यू इंग्लिश स्कूल के सभागृह में वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र मुलीक की पुस्तक 'सुडाचं राजकारण' का विमोचन समारोह आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम के दौरान मंच पर संजय राउत और मंत्री आशीष शेलार न केवल एक साथ पहुंचे, बल्कि पूरे समारोह के दौरान एक-दूसरे के ठीक बगल में पास-पास बैठे नजर आए।
महाराष्ट्र की राजनीति में एक-दूसरे के धुर विरोधी माने जाने वाले इन दोनों दिग्गज नेताओं का एक ही मंच पर एक साथ बैठना और आपस में संवाद करना पूरे राजनीतिक हलके तथा मीडिया में उत्सुकता का मुख्य केंद्र बन गया है।
इससे ठीक एक दिन पहले, यानी गुरुवार को मुंबई के दादर में भी ऐसा ही एक अप्रत्याशित दृश्य देखने को मिला था। वहां प्रसिद्ध व्यंग्यचित्रकार प्रशांत कुलकर्णी द्वारा संपादित पुस्तक महाराष्ट्राच्या हास्यरेषा के विमोचन समारोह का आयोजन किया गया था।
उस समारोह में राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, सांस्कृतिक कार्य मंत्री आशीष शेलार के साथ-साथ उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे एक साथ मंच पर उपस्थित थे।
दादर के कार्यक्रम के दौरान मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने इस दुर्लभ राजनीतिक एकजुटता पर अपने विचार व्यक्त किए थे। उन्होंने कहा था कि जीवन में और समाज में कुछ ऐसे मंच व अवसर होते हैं, जहां राजनीतिक मतभेदों को पूरी तरह से गाड़कर या छोड़कर एक साथ आना पड़ता है।
उन्होंने जोर देकर कहा था कि राजनीतिक विरोध के बावजूद ऐसे मौकों पर एक मंच पर आना ही महाराष्ट्र की समृद्ध संस्कृति और महान परंपरा रही है।
लगातार दो दिनों में घटे इन दो बड़े घटनाक्रमों के बाद अब यह सवाल जोर पकड़ रहा है कि आखिर महाराष्ट्र राज्य की राजनीति में चल क्या रहा है? क्या यह महज साहित्यिक व सांस्कृतिक कार्यक्रमों की औपचारिक शिष्टाचार भेंट है या फिर राजनीतिक विरोधियों के बीच किसी नई हलचल की शुरुआत है? लगातार दो दिन घटे इन अप्रत्याशित राजनीतिक दृश्यों ने आम जनता और राजनीतिक विश्लेषकों दोनों का ध्यान पूरी तरह अपनी ओर खींच लिया है।