महाराष्ट्र सूखा, प्रतीकात्मक तस्वीर सोर्स- सोशल मीडिया
मुंबई

IMD Climate Study: महाराष्ट्र के भीतरी इलाके हो रहे गर्म और शुष्क, कोंकण में बढ़ रहा अधिक बारिश वाला क्षेत्र

Maharashtra Drought: आईएमडी के सात दशकों के अध्ययन से खुलासा हुआ है कि महाराष्ट्र के मराठवाड़ा और विदर्भ अधिक गर्म और शुष्क हो रहे हैं, जबकि कोंकण में मानसूनी बारिश का दायरा बढ़ रहा है।

रूपम सिंह

Highlights

  • IMD के अध्ययन में महाराष्ट्र के भीतरी इलाकों में गर्म और शुष्क जलवायु बढ़ने के संकेत।

  • मराठवाड़ा और पश्चिम विदर्भ ट्रॉपिकल सवाना से गर्म अर्ध-शुष्क जलवायु क्षेत्र में आए।

  • कोंकण में आर्द्र मानसूनी जलवायु का विस्तार, खेती और जल प्रबंधन की चुनौतियां बढ़ने की आशंका।

IMD Climate Study Maharashtra Drought: भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के एक नए अध्ययन के अनुसार महाराष्ट्र में जलवायु में दो विपरीत दीर्घकालिक बदलाव देखने को मिल रहे हैं। राज्य के भीतरी इलाकों के कुछ हिस्से अधिक गर्म और शुष्क स्थितियों की ओर बढ़ रहे हैं, जबकि कोंकण तट के साथ सबसे अधिक बारिश वाले जलवायु क्षेत्र का विस्तार हो रहा है।

ये निष्कर्ष बताते हैं कि राज्य भर में बारिश और तापमान के पैटर्न बदलने से कृषि, जल प्रबंधन और जलवायु संबंधी तैयारियों के लिए चुनौतियां बढ़ रही हैं। यह चेतावनी ऐसे समय में आई है जब महाराष्ट्र के लिए मानसून का यह वर्ष काफी मुश्किल रहा है। 26 सितंबर को राज्य के 358 तालुकों में से 305 में सूखे की घोषणा की गई, जबकि मौसमी बारिश सामान्य से 19% कम रही।

अल नीनो स्थितियों वाले इस साल में राष्ट्रीय स्तर पर बारिश में 12.6% की कमी दर्ज की गई, अल नीनो की स्थिति आमतौर पर दक्षिण-पश्चिम मानसून को कमजोर कर देती है। यह शोध 7 दशकों के मौसम संबंधी आंकड़ों पर आधारित है। इसमें 1961-1990 और 1991-2020 की दो लगातार 30-वर्षीय अवधियों के बीच भारत के जलवायु क्षेत्रों में आए बदलावों का विश्लेषण किया गया है। शोधकर्ताओं के अनुसार, 1961-1990 के दौरान मराठवाड़ा और पश्चिम विदर्भमुख्य रूप से ट्रॉपिकल सवाना क्षेत्र का हिस्सा थे, लेकिन 1991-2020 तक ये गर्म अर्ध-शुष्क श्रेणी में आ गए।

दिन और रात के बढ़ते तापमान को इस बदलाव का मुख्य कारण माना गया है। ट्रॉपिकल सवाना क्षेत्रों में एक स्पष्ट शुष्क मौसम होता है, जबकि गर्म अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में तापमान अधिक रहता है और बारिश अपेक्षाकृत कम होती है। इस बदलाव का असर फसलों के चयन, बुवाई के समय और सिंचाई की मांग पर पड़ सकता है। खासकर उन इलाकों में जहां खेती काफी हद तक मौसमी बारिश पर निर्भर करती है।

इन नतीजों का भविष्य के लिए मतलब

तापमान और बारिश के पैटर्न में बदलाव से यह तय हो सकता है कि किसी क्षेत्र के लिए कौन सी फसले उपयुक्त हैं, बुआई कब होनी चाहिए और सिंचाई की कितनी आवश्यकता होगी। ये नतीजे बताते है कि मराठवाड़ा और पश्चिमी विदर्भ में गर्मी और सूखे से निपटने की क्षमता बढ़ाने, जल संरक्षण और फसल योजना पर ज्यादा ध्यान देने से गर्म और शुष्क हालात से जुड़े जोखिमों को कम करने में मदद मिल सकती है।

कोकण तट पर योजना बनाने वालों को इस क्षेत्र में लंबे समय में बदल रहे बारिश के पैटर्न को ध्यान में रखना होगा। साथ ही बारिश से जुड़े अन्य जोखिमों के लिए भी तैयारी रखनी होगी। यह अध्ययन इस बात पर भी जोर देता है कि कृषि और जल सुरक्षा से जुड़े फैसले लेते समयहर जगह के हिसाब से अलग-अलग आकलन और कदम उठाने की जरूरत है।

कोंकण का आर्द्र जलवायु क्षेत्र रहा है फैल

जहां महाराष्ट्र राज्य के भीतरी इलाकों में जलवायु अधिक गर्म और शुष्क होती जा रही है, वहीं पश्चिमी तट पर स्थिति काफी अलग है। अध्ययन से पता चलता है कि कोंकण, गोवा, तटीय कर्नाटक और केरल में उष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु क्षेत्र का विस्तार हो रहा है।

इस क्षेत्र में भारी मौसमी बारिश होती है। व्यापक भौगोलिक स्तर पर, शोधकर्ताओं ने पाया कि उत्तरी मैदानी इलाकों में बारिश कम हो रही है, जबकि इसके विपरीत दक्षिणी भारत में बारिश बढ़ रही है।

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