अबू आसिम आजमी (pic credit; social media) 
मुंबई

अबू आजमी की चौथी जीत के बाद भी सपा में उथल-पुथल, गोवंडी में कार्यकर्ताओं का मोहभंग बढ़ा

Mumbai News: आजमी की चौथी जीत के बावजूद सपा में उथल-पुथल जारी है। गोवंडी में कार्यकर्ताओं का मोहभंग बढ़ रहा है। जिससे स्थानीय नेताओं की नाराजगी बढ़ रही है।

सोनाली चावरे

MUMBAI SP PARTY: समाजवादी पार्टी (सपा) का माना जाने वाला अभेद्य गढ़, मानखुर्द-शिवाजी नगर विधानसभा क्षेत्र, पिछले डेढ़ दशक में पहली बार संकट में नजर आ रहा है। प्रदेश अध्यक्ष और सपा के दिग्गज नेता अबू आसिम आजमी ने 2024 के विधानसभा चुनाव में एनसीपी के पूर्व मंत्री नवाब मलिक को हराकर चौथी बार जीत हासिल की थी, लेकिन पार्टी के भीतर उथल-पुथल थमने का नाम नहीं ले रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सपा की नीतियों और नेतृत्व के फैसलों ने इस गढ़ को कमजोर किया है।

फरवरी 2024 में सपा के पूर्व नगरसेवक अख्तर कुरैशी और बाद में आयशा नूरजहां रफीक शेख ने एकनाथ शिंदे की शिवसेना में शामिल होकर पार्टी को बड़ा झटका दिया। सूत्रों के अनुसार, एक और पूर्व नगरसेवक बीएमसी चुनाव में आरक्षित सीट की घोषणा के बाद पाला बदल सकता है। सपा के पांच नगरसेवकों में से दो का पार्टी छोड़ना कार्यकर्ताओं में असंतोष का स्पष्ट संकेत है।

सबसे बड़ा विवाद युवा नेता जमीर कुरैशी के निष्कासन को लेकर है। स्थानीय लोगों का कहना है कि गोवंडी में बाहरी नेताओं को थोपना सपा का आत्मघाती कदम है। उनका मानना है कि जिसका यहां वोट नहीं है, वह उनका सही प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता। करीब 16 लाख की आबादी और 7 लाख मतदाताओं वाला यह उत्तर भारतीय-मुस्लिम बहुल क्षेत्र मुंबई की महत्वपूर्ण सीटों में से एक माना जाता है।

आजमी ने अपने कट्टर प्रतिद्वंद्वी और कांग्रेस के पूर्व विधायक यूसुफ अब्राहनी और पूर्व नगरसेवक सिराज शेख को सपा में शामिल कर नई रणनीति तैयार की, लेकिन इससे स्थानीय नेताओं में नाराजगी बढ़ी है।

पूर्व नगरसेवक कुरैशी शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य कर रहे थे। उनके द्वारा चलाई जा रही मुफ्त सिलाई और मेहंदी क्लासेस से सैकड़ों महिलाएं लाभान्वित हो रही थीं। कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस तरह की स्थानीय पहल को नजरअंदाज करना और बाहरी नेताओं को थोपना पार्टी की जड़ें कमजोर कर रहा है।

सपा कार्यकर्ताओं के मोहभंग से पार्टी को गोवंडी में आगामी चुनावों में चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि स्थानीय नेतृत्व और कार्यकर्ताओं की नाराजगी को कम करना सपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गई है।

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