सूखा राहत को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार से जवाब मांगा।
305 तहसीलों में सूखे के बावजूद भूमिहीन मजदूरों को राहत नहीं मिलने का आरोप।
हाईकोर्ट ने योजनाओं का ब्योरा मांगा, अगली सुनवाई 17 नवंबर को।
Bombay High Court Maharashtra Drought: महाराष्ट्र की 358 में से 305 तहसीलों में सूखा घोषित किए जाने के बावजूद भूमिहीन खेतिहर मजदूरों, छोटे किसानों और प्रवासी श्रमिकों तक सरकारी राहत नहीं पहुंचने का मामला अब बॉम्बे हाईकोर्ट पहुंच गया है।
इस मुद्दे पर दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने राज्य सरकार से जवाब मांगा है। हाईकोर्ट ने पूछा है कि सूखे से निपटने के लिए अब तक क्या-क्या कदम उठाए गए हैं और प्रभावित लोगों के लिए कौन-सी नई योजनाएं शुरू की गई हैं।
मुख्य न्यायाधीश महेश सी. त्रिपाठी और न्यायमूर्ति अद्वैत सेठना की पीठ के समक्ष बुधवार को मामले की सुनवाई हुई। अदालत ने राज्य के महाधिवक्ता मिलिंद साठे से इस मामले में हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया। साथ ही महाधिवक्ता और सरकारी वकील पी. ए. काकडे को सरकार की ओर से सूखा राहत उपायों और नई योजनाओं की विस्तृत सूची हलफनामे के माध्यम से पेश करने का निर्देश दिया। मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर को निर्धारित की गई है।
स्वाभिमानी मजदूर संघ की ओर से दाखिल जनहित याचिका में भूमिहीन खेतिहर मजदूरों को अधिसूचित अकुशल श्रमिकों के न्यूनतम वेतन के आधार पर बेरोजगारी भत्ता और आर्थिक सहायता देने की मांग की गई है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि सूखे के कारण खेती से जुड़े रोजगार के अवसर कम हो गए हैं। ऐसे में रोजाना मजदूरी पर निर्भर परिवारों के सामने आजीविका का संकट खड़ा हो गया है।
याचिका में महाराष्ट्र सूखाग्रस्त इलाकों में बिना किसी शर्त के मुफ्त अनाज और भोजन उपलब्ध कराने की मांग की गई है। इसके अलावा पीने के पानी के लिए टैंकरों की व्यवस्था और पशुओं के लिए पर्याप्त चारा मुहैया कराने की मांग भी उठाई गई है।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, राजस्व में छूट और अल्पकालीन फसल ऋण के पुनर्गठन जैसी सरकारी योजनाओं का लाभ मुख्य रूप से जमीन मालिकों और बैंकों से फसल ऋण लेने वाले किसानों को मिलता है। भूमिहीन मजदूरों के पास न जमीन होती है और न ही औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से लिया गया फसल ऋण। इस वजह से वे राहत योजनाओं से बाहर रह जाते हैं।
संघ ने इसे मनमाना वर्गीकरण बताते हुए संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन करार दिया है। अब बॉम्बे हाईकोर्ट में 17 नवंबर को होने वाली सुनवाई पर सभी की नजरें टिकी हैं।