बॉम्बे हाई कोई व ईडी (सोर्स: सोशल मीडिया) 
मुंबई

बॉम्बे हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: ED को आदेश, जब्त 46 करोड़ के ब्याज का आधा हिस्सा दें सेना कल्याण कोष में!

Bombay High Court ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) को एक मामले में जब्त 46.5 करोड़ रुपये पर अर्जित ब्याज का 50% हिस्सा 'सशस्त्र बल युद्ध हताहत कल्याण कोष' में जमा करने का निर्देश दिया है।

आकाश मसने

Armed Forces Welfare Fund: देश की सीमाओं की रक्षा करने वाले वीर जवानों के परिवारों के सम्मान में बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक मिसाल पेश की है। अदालत ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) की एक अपील को खारिज करते हुए न केवल एक निजी कंपनी की जब्त राशि लौटाने का आदेश दिया, बल्कि उस पर मिले ब्याज का आधा हिस्सा शहीद परिवारों की मदद के लिए दान करने का निर्देश दिया है।

शहीद परिवारों की सहायता 'अत्यंत आवश्यक': हाई कोर्ट

बॉम्बे हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति ए. एस. गडकरी और न्यायमूर्ति आर. आर. भोंसले की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए भारतीय सैनिकों के समर्पण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि देश के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले सैनिकों के परिवारों और उनकी विधवाओं की सहायता करना 'अत्यंत आवश्यक' है। इसी मानवीय दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए, पीठ ने निर्देश दिया कि शापूरजी पलोनजी एंड कंपनी लिमिटेड (SPCL) से संबंधित मामले में जमा 46.5 करोड़ रुपये की राशि पर जो भी ब्याज अर्जित हुआ है, उसका 50 प्रतिशत हिस्सा 'सशस्त्र बल युद्ध हताहत कल्याण कोष' को सौंप दिया जाना चाहिए। अदालत ने माना कि यह कदम उन वीर जवानों के प्रति एक छोटा सा सम्मान है जिन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना सीमाओं की रक्षा की।

क्या था पूरा कानूनी विवाद ?

यह कानूनी लड़ाई 2019 से चल रही थी, जब प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने शापूरजी पलोनजी एंड कंपनी (SPCL) की 141.50 करोड़ रुपये मूल्य की संपत्तियों की कुर्की की थी। ED का दावा था कि कंपनी द्वारा नीलेश ठाकुर (एक पूर्व लोकसेवक) और उनकी कंपनियों को अलीबाग और पेन में 900 एकड़ जमीन खरीदने के लिए दिया गया पैसा 'अपराध की आय' (Proceeds of Crime) था। यह मामला आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक संपत्ति अर्जित करने से जुड़ा था।

हालांकि, SPCL ने इस कुर्की को चुनौती देते हुए दलील दी कि यह भुगतान पूरी तरह वैध था और आयकर रिकॉर्ड में इसे जमीन खरीद के लिए 'अग्रिम भुगतान' के रूप में दर्ज किया गया था। कंपनी ने यह भी तर्क दिया कि जिस समय यह भुगतान किया गया, नीलेश ठाकुर लगभग चार वर्षों से 'अवैध अवकाश' पर थे और किसी सार्वजनिक कर्तव्य का पालन नहीं कर रहे थे।

अपीलीय न्यायाधिकरण और हाई कोर्ट का अंतिम आदेश

जनवरी 2019 में धनशोधन निवारण अधिनियम (PMLA) न्यायाधिकरण ने कंपनी की दलीलों को स्वीकार कर लिया था और संपत्तियों को मुक्त करने का आदेश दिया था। ED ने इस फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील की थी, जिस पर अदालत ने शुरू में रोक लगा दी थी लेकिन 46.5 करोड़ रुपये जमा करने का निर्देश दिया था।

अपने अंतिम फैसले में, उच्च न्यायालय ने न्यायाधिकरण के निर्णय को बरकरार रखा और ED की अपील खारिज कर दी। अदालत ने अब वह जमा राशि शापूरजी पलोनजी कंपनी को वापस करने का आदेश दिया है, लेकिन उस पर मिले ब्याज के एक बड़े हिस्से को सैन्य कल्याण के लिए समर्पित कर दिया है।

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