Umarda Cow And Madgyal Sheep Get National Breed Status: महाराष्ट्र के पशुधन क्षेत्र के लिए एक ऐतिहासिक और गौरवशाली क्षण सामने आया है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (NBAGR), करनाल ने राज्य की दो महत्वपूर्ण स्थानीय पशु नस्लों को आधिकारिक रूप से राष्ट्रीय स्तर पर पंजीकृत कर लिया है। 7 अगस्त 2026 को आयोजित ब्रीड रजिस्ट्रेशन कमेटी की 14वीं बैठक में इस प्रस्ताव को अंतिम मंजूरी दी गई।
इस दोहरे गौरव के तहत विदर्भ के 'उमरडा गोवंश' (स्वतंत्र देशी गाय की नस्ल) और सांगली क्षेत्र की प्रसिद्ध 'माडग्याल भेड़' को स्वतंत्र राष्ट्रीय नस्ल के रूप में मान्यता प्रदान की गई है।
महाराष्ट्र की पशुसंवर्धन मंत्री पंकजा मुंडे ने इस उपलब्धि पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए इसे महाराष्ट्र के पशुपालकों के लिए एक बड़ी जीत बताया है। उन्होंने कहा कि इस राष्ट्रीय पहचान से अब पारंपरिक पशुधन के संरक्षण को एक ठोस वैज्ञानिक और संस्थागत आधार मिलेगा। इसके साथ ही इन विशिष्ट नस्लों के शुद्ध संवर्धन से भविष्य में ग्रामीण क्षेत्रों के पशुपालकों की आय बढ़ाने में मदद मिलेगी।
पशुसंवर्धन विभाग के सचिव डॉ. रामास्वामी एन. ने इस प्रक्रिया की तकनीकी महत्ता को समझाते हुए बताया कि राष्ट्रीय पंजीकरण मिलने के बाद अब उमरडा गोवंश और माडग्याल भेड़ की आनुवंशिक क्षमता को और मजबूत किया जा सकेगा। स्थानीय विषम परिस्थितियों और बदलते मौसम के अनुकूल ढलने के उनके प्राकृतिक गुणों को ध्यान में रखते हुए, वैज्ञानिक संरक्षण और वैज्ञानिक प्रजनन के व्यापक अवसर अब उपलब्ध होंगे।
उमरडा नस्ल मुख्य रूप से अपनी मजबूती और कम खर्च में बेहतर काम करने के लिए जानी जाती है। इनका शरीर चमकदार सफेद या हल्का भूरा होता है, जो धूप को प्रतिबिंबित कर इन्हें गर्मी से बचाता है।
उमरडा नस्ल अपने मजबूत कद-काठी और स्थानीय शुष्क जलवायु में टिके रहने के लिए जानी जाती है। यह गाय विदर्भ के सूखे और गर्म मौसम को आसानी से झेल लेती है और साधारण सूखे चारे पर भी स्वस्थ रहती है। यह स्वतंत्र देशी गाय मुख्य रूप से पश्चिम विदर्भ के यवतमाल, वाशिम और अमरावती जिलों में पाई जाती है।
माडग्याल भेड़ को देश की सबसे अनोखी और कीमती भेड़ों में गिना जाता है, इनका चेहरा सामने से तोते जैसी घुमावदार नाक वाला होता है, जो इन्हें दूसरी भेड़ों से बिल्कुल अलग लुक देता है। इस नस्ल के मेमने बहुत तेजी से वजन बढ़ाते हैं। कम समय में इनका वजन 50 से 80 किलोग्राम तक पहुंच जाता है। इसके मांस की गुणवत्ता बहुत अच्छी होती है, जिसके कारण बाजार में इसकी मांग और कीमत सबसे ज्यादा होती है।
सांगली जिले के सूखाग्रस्त इलाकों में रहने के कारण यह भेड़ कम पानी और कम चारे में भी कई किलोमीटर पैदल चल सकती है। इनमें बीमारियों से लड़ने की गजब की क्षमता होती है, जिससे इनके मेमनों की मृत्यु दर बहुत कम होती है।
इस महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मान्यता के बाद, इन दोनों स्वदेशी नस्लों के शुद्ध आनुवंशिक संवर्धन, नस्ल सुधार और इनके संरक्षण के लिए केंद्र और राज्य सरकार द्वारा विशेष योजनाओं का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है।