शिव सेना नेता प्रतीकात्मक तस्वीर (सोर्स - सोशल मिडिया)  
गढचिरोली

गड़चिरोली में उद्धव सेना की बढ़ीं मुश्किलें, गुटबाजी और नेतृत्व संकट से संगठन कमजोर

Shiv Sena Leadership Dispute: गड़चिरोली में शिवसेना संगठनात्मक संकट से जूझती नजर आ रही है। पवन गेडाम को नया जिला प्रमुख बनाने पर भड़की अंदरूनी कलह। नाराज गुट ने पार्टी दफ्तर में की तोड़फोड़।

केतकी मोडक

Gadchiroli Shivsena UBT Internal Conflict: गड़चिरोली जिले में कभी प्रभावशाली राजनीतिक ताकत मानी जाने वाली शिवसेना (उद्धव) आज गंभीर संगठनात्मक चुनौतियों का सामना करती दिखाई दे रही है। हाल के दिनों में जिला स्तर पर हुए नेतृत्व परिवर्तन, पदाधिकारियों की नाराजगी, पार्टी कार्यालय में तोड़‌फोड़ की घटना तथा बढ़ते गुटबाजी के आरोपों ने पार्टी की आंतरिक स्थिति को सार्वजनिक कर दिया है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि जिले में पार्टी की संगठनात्मक पकड़ लगातार कमजोर होती जा रही है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पूर्व जिला प्रमुख सुरेंद्र सिंह चंदेल तथा हरीश मने के कार्यकाल में शिवसेना ने जिले में मजबूत जनाधार और संगठन खड़ा किया था। उस दौर में पार्टी विभिन्न जनहित के मुद्दों पर सक्रिय रहती थी और ग्रामीण क्षेत्रों तक उसकी मजबूत पहुंच थी। हालांकि, उनके बाद पार्टी को जिले में वैसा प्रभावी नेतृत्व नहीं मिल सका, जो संगठन को नई दिशा और ऊर्जा दे पाता।

इसका असर पार्टी की सक्रियता और विस्तार पर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा। महाराष्ट्र में शिवसेना के विभाजन के बाद गड़चिरोली जिले के कई पुराने और निष्ठावान कार्यकर्ता तथा पदाधिकारी मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट में शामिल हो गए। इससे उद्धव ठाकरे गुट की संगठनात्मक शक्ति को बड़ा नुकसान पहुंचा। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यकर्ताओं के पलायन और स्थानीय नेतृत्व की कमी के कारण पार्टी की पकड़ कमजोर होती गई।

इसका प्रभाव चुनावी राजनीति और संगठन दोनों पर पड़ा है। पूर्व जिला प्रमुख वासुदेव शेडमाके के कार्यकाल को लेकर भी पार्टी के भीतर असंतोष की चर्चा रही है। आलोचकों का कहना है कि उनके नेतृत्व में संगठन अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ पाया। जिले के महत्वपूर्ण मुद्दों पर बड़े आंदोलन, मोर्चे या जनसंघर्ष देखने को नहीं मिले। इसके अलावा, स्थानीय निकाय चुनावों में भी पार्टी का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं रहा।

महिला आघाड़ी का जिला स्तर का पद लंबे समय से रिक्त रहने को भी संगठनात्मक कमजोरी का उदाहरण माना जा रहा है। हाल ही में युवासेना के जिला प्रमुख पवन गेडाम को शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) का नया जिला प्रमुख नियुक्त किया गया। इस निर्णय के बाद पूर्व जिला प्रमुख वासुदेव शेडमाके और उनके समर्थकों में नाराजगी की खबरें सामने आई। इसी पृष्ठभूमि में शनिवार को गड़चिरोली शहर स्थित पार्टी कार्यालय में तोड़फोड़ की घटना हुई।

आरोप है कि कुछ समर्थकों ने कार्यालय में प्रवेश कर वहां की संपत्ति को नुकसान पहुंचाया तथा एसी, पंखे, टेबल, कुर्सियां और अन्य सामान अपने साथ ले गए, इस घटना ने पार्टी के अंदरूनी विवाद को खुलकर सामने ला दिया है।

ओबीसी प्रतिनिधित्व का मुद्दा भी बना चर्चा का विषय

  • गड़चिरोली जिले में आदिवासी समुदाय के साथ-साथ ओबीसी समाज की भी बड़ी आबादी है। ऐसे में जिला प्रमुख पद पर ओबीसी समाज को प्रतिनिधित्व नहीं मिलने को लेकर कुछ कार्यकर्ताओं में नाराजगी देखी जा रही है।
  • राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सामाजिक संतुलन बनाए रखना किसी भी राजनीतिक दल के लिए महत्वपूर्ण होता है। यदि इस नाराजगी को समय रहते दूर नहीं किया गया, तो इसका असर संगठन पर पड़ सकता है।

शिंदे गुट को मिल सकता है राजनीतिक लाभ

उद्धव सेना के भीतर बढ़ते मतभेदों और गुटबाजी का सबसे बड़ा राजनीतिक लाभ शिंदे गुट को मिल सकता है। राजनीतिक इतिहास बताता है कि जब किसी दल में आंतरिक संघर्ष बढ़ता है, तो उसका सीधा फायदा प्रतिद्वंद्वी दलों को मिलता है। यदि पार्टी नेतृत्व समय रहते नाराज नेताओं और कार्यकर्ताओं को साथ लाने में सफल नहीं होता, तो आने वाले स्थानीय निकाय चुनावों और अन्य राजनीतिक मुकाबलों में इसका असर देखने को मिल सकता है।

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