Sambhajinagar Kanchanwadi Waste Plant: छत्रपति संभाजीनगर शहर को गीले कचरे की समस्या से निजात दिलाने के लिए कांचनवाडी में करोड़ों रुपये खर्च कर तैयार किया गया ग्रीन वेस्ट प्लांट आठ साल से बंद पड़ा है।
करीब 35 करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद 30 मीट्रिक टन प्रतिदिन क्षमता वाले इस संयंत्र में न तो नियमित रूप से कचरे की प्रक्रिया हो रही है और न ही बायोगैस का उत्पादन वर्ष 2018 में तैयार हुए इस प्रोजेक्ट की मशीनरी अब धूल खा रही है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब शहर के होटल, मंगल कार्यालय और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से रोजाना बड़ी मात्रा में गीला कचरा निकलता है, तो इस प्लांट के लिए पर्याप्त कचरा क्यों नहीं जुटाया जा सका। करोड़ों रुपये की लागत से तैयार परियोजना का लाभ शहर को नहीं मिलने से छत्रपति संभाजीनगर महापानगरलिका की कचरा प्रबंधन व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
नारेगाव कचरा डिपो बंद होने के बाद शहर के सामने कचरा निपटान का बड़ा संकट खड़ा हुआ था। इस समस्या से निपटने के लिए राज्य सरकार ने करीब 142 करोड़ रुपये के विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन को मंजूरी दी थी।
इसके तहत चिकलथाना, पडेगांव और हर्सूल में 150-150 मीट्रिक टन क्षमता वाले कचरा प्रसंस्करण संयंत्र तथा कांचनवाडी में 30 मीट्रिक टन क्षमता का गीला कचरा प्रसंस्करण संयंत्र स्थापित करने की योजना बनाई गई।
कांचनवाडी के प्रोजेक्ट से गीले कचरे का वैज्ञानिक तरीके से प्रसंस्करण कर बायोगैस तैयार करने की उम्मीद थी। परियोजना प्रबंधन सलाहकार के तौर पर इंदौर की एक संस्था को नियुक्त किया गया था, जबकि संयंत्र का निर्माण बॉको नामक ठेकेदार कंपनी के माध्यम से कराया गया।
प्रोजेक्ट तैयार होने के बाद कुछ समय तक होटलों से निकलने वाला गीला कचरा संयंत्र तक पहुंचाया गया। इसी कचरे से बायोगैस तैयार करने की प्रक्रिया शुरू करने का प्रयास किया गया। लेकिन संयंत्र पूरी क्षमता से चल पाता, उससे पहले ही काम में रुकावटें आने लगीं। ठेकेदार द्वारा काम अधूरा छोड़ दिए जाने की बात सामने आई।
इसके बाद छत्रपति संभाजीनगर मनपा प्रशासन की ओर से संयंत्र को व्यवस्थित रूप से शुरू करने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए गए। वर्ष 2018 में तैयार हुए इस प्रोजेक्ट में गीले कचरे के प्रसंस्करण के बाद अपेक्षित मात्रा में बायोगैस नहीं बनने की समस्या भी सामने आई थी। धीरे-धीरे परियोजना ठप हो गई और अब आठ वर्ष से इसकी मशीनरी इस्तेमाल के इंतजार में है।
कांचनवाडी प्लांट के बंद रहने के पीछे सबसे प्रमुख कारण पर्याप्त मात्रा में गीला कचरा उपलब्ध नहीं होना बताया गया। संयंत्र की क्षमता प्रतिदिन 30 मीट्रिक टन है, लेकिन इस क्षमता के अनुरूप कचरा नियमित रूप से उपलब्ध नहीं कराया जा सका।
यह तर्क इसलिए भी सवालों के घेरे में है क्योंकि शहर में होटल, रेस्तरां, मंगल कार्यालय और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से रोजाना बड़ी मात्रा में गीला कचरा निकलता है। यदि इन सभी स्रोतों से निकलने वाले कचरे का व्यवस्थित संकलन और परिवहन किया जाए तो प्लांट को आवश्यक मात्रा में कचरा उपलब्ध कराया जा सकता है।
जिस संयंत्र को शहर की गीले कचरे की समस्या का स्थायी समाधान माना गया था, उसी के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए गए। लेकिन आठ साल से बंद होने के कारण यहां स्थापित मशीनरी और उपकरणों का अपेक्षित उपयोग नहीं हो पा रहा है। लंबे समय तक बंद रहने से उपकरणों के रखरखाव और उनकी तकनीकी स्थिति पर भी सवाल उठ रहे हैं।
यदि संयंत्र को दोबारा शुरू करने के लिए मशीनरी की मरम्मत या नए उपकरणों की आवश्यकता पड़ी तो मनपा पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ने की आशंका है। यानी पहले ही करोड़ों खर्च करने के बाद अब इसे शुरू करने के लिए फिर से खर्च करना पड़ सकता है।
कांचनवाडी का प्लांट बंद होने का सबसे सीधा असर गीले कचरे के निपटान पर पड़ रहा है। होटल, मंगल कार्यालय और अन्य प्रतिष्ठानों से निकलने वाले कचरे की मात्रा लगातार बढ़ रही है। इसके बावजूद जिस प्रोजेक्ट को इसी कचरे के वैज्ञानिक निपटारे के लिए तैयार किया गया था, वह वर्षों से बंद है।
ऐसे में छत्रपति संभाजीनगर मनपा प्रशासन को यह स्पष्ट करना होगा कि इन प्रतिष्ठानों से निकलने वाले गीले कचरे का वर्तमान में किस तरह निपटारा किया जा रहा है। साथ ही यह भी बताना होगा कि 35 करोड़ रुपये खर्च होने के बाद भी आठ वर्षों से बंद पड़े संयंत्र को दोबारा शुरू करने की समयबद्ध योजना क्या है।
कांचनवाडी प्रोजेक्ट की मौजूदा स्थिति केवल एक बंद संयंत्र की कहानी नहीं है, बल्कि यह महापालिका की कचरा प्रबंधन योजना, निगरानी और करोड़ों रुपये के सार्वजनिक धन के उपयोग पर भी सवाल खड़े करती है। शहर में कचरे की समस्या लगातार गंभीर बनी हुई है और दूसरी ओर तैयार संयंत्र वर्षों से बंद पड़ा है।
अब जरूरत केवल प्लांट को दोबारा शुरू करने की घोषणा करने की नहीं, बल्कि यह तय करने की है कि परियोजना क्यों विफल हुई, खर्च की गई राशि का अपेक्षित लाभ क्यों नहीं मिला और जिम्मेदारी किसकी है। नागरिकों की नजर अब महापालिका के अगले कदम पर है।