Ajanta Caves Rainwater Leakage: महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर जिले में स्थित विश्व प्रसिद्ध अजंता गुफाएं एक बार फिर बारिश के दौरान पानी के रिसाव को लेकर चर्चा में हैं। सोशल मीडिया पर गुफाओं के भीतर छत से टपकते पानी को बाल्टियों में जमा किए जाने का वीडियो वायरल होने के बाद प्राचीन धरोहर की सुरक्षा को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
वीडियो सामने आने के बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि भारी बारिश के दौरान चट्टानों से पानी का रिसाव होना अजंता की भौगोलिक और प्राकृतिक संरचना से जुड़ी समस्या है। पर्यटकों को फिसलने से बचाने और पानी को एक जगह जमा करने के लिए रिसाव वाले स्थानों के नीचे बाल्टियां रखी जाती हैं। ASI की उपाधीक्षक शिल्पा जामगड़े के अनुसार, फिलहाल इस रिसाव से गुफाओं में मौजूद प्राचीन चित्रों और मूर्तियों को कोई खतरा नहीं है।
लेकिन कहानी सिर्फ इतनी नहीं है। अजंता में पानी का रिसाव आज से शुरू हुई समस्या नहीं है। इस धरोहर को संरक्षित करने के दौरान ASI और संरक्षण विशेषज्ञ लंबे समय से चट्टानों में पानी के प्रवेश और उसके प्रभाव को लेकर काम करते रहे हैं।
अजंता की गुफाएं किसी सामान्य इमारत की तरह बनाई हुई संरचनाएं नहीं हैं। इन्हें पहाड़ की चट्टानों को काटकर बनाया गया है। यही इसकी सबसे बड़ी खूबसूरती भी है और संरक्षण की सबसे बड़ी चुनौती भी।
मानसून के दौरान जब आसपास के क्षेत्र में भारी बारिश होती है, तो पानी पहाड़ी चट्टानों की प्राकृतिक दरारों और छिद्रों में प्रवेश करता है। पानी चट्टान की परतों के बीच से रास्ता बनाते हुए नीचे की ओर आता है और कुछ स्थानों पर गुफाओं के भीतर रिसने लगता है।
ASI अधिकारी शिल्पा जामगड़े ने भी मौजूदा स्थिति को इसी प्राकृतिक प्रक्रिया से जोड़ा है। उनका कहना है कि तेज बारिश के दौरान चट्टानों के अंदर मौजूद छिद्रों से पानी नीचे आता है। ऐसे समय में रिसाव वाले स्थानों पर बाल्टियां रखना एक एहतियाती उपाय है।
हां, मानसून के दौरान पानी के रिसाव की समस्या अजंता में पहले भी सामने आती रही है। उपलब्ध पुराने रिकॉर्ड बताते हैं कि यह समस्या कम-से-कम दो दशक से अधिक समय से संरक्षण एजेंसियों के सामने है।
2006 की रिपोर्टों में बताया गया था कि 2003 में भारी बारिश के बाद अजंता की कई गुफाओं में पानी के रिसाव की समस्या गंभीर रूप से सामने आई थी। उस समय कुछ गुफाओं में बारिश के दौरान रिसाव होने पर ASI कर्मचारियों को पानी जमा करने के लिए बाल्टियां और अन्य बर्तन रखने पड़ते थे।
2006 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी अजंता गुफाओं में पानी के रिसाव और लीकेज को लेकर चिंता जताई थी और ASI को इसे रोकने के लिए तत्काल कदम उठाने के निर्देश दिए थे। उस समय विशेष रूप से गुफा संख्या 17 में रिसाव का उल्लेख हुआ था, जहां भगवान बुद्ध के जीवन और बौद्ध कथाओं से जुड़े महत्वपूर्ण भित्तिचित्र मौजूद हैं।
इससे साफ है कि बाल्टियां दिखाई देना कोई पहली बार सामने आई तस्वीर नहीं है, बल्कि मानसून में रिसाव से निपटने के लिए पहले भी ऐसा अस्थायी उपाय अपनाया जाता रहा है।
यह सवाल सबसे महत्वपूर्ण है। मौजूदा वायरल वीडियो के संदर्भ में ASI ने कहा है कि फिलहाल गुफाओं में मौजूद चित्रों और मूर्तियों को कोई खतरा नहीं है। इसलिए वायरल वीडियो के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि अजंता की ऐतिहासिक कलाकृतियां अभी क्षतिग्रस्त हो रही हैं।
लेकिन इसका यह अर्थ भी नहीं है कि पानी और नमी संरक्षण के लिहाज से पूरी तरह महत्वहीन हैं।
UNESCO के अजंता से जुड़े संरक्षण रिकॉर्ड में भी पानी के रिसाव को लंबे समय से ध्यान देने योग्य विषय माना गया है। UNESCO के एक पुराने संरक्षण रिकॉर्ड में बताया गया था कि गुफाओं के ऊपर पेड़ों की जड़ें चट्टानों में दरारें बढ़ा सकती हैं और इससे पानी के रिसाव की संभावना बढ़ सकती है। ऐसे पर्यावरणीय प्रभावों का भित्तिचित्रों और मूर्तियों पर दीर्घकालिक असर पड़ सकता है।
ASI के संरक्षण संबंधी दस्तावेजों में भी अजंता के चित्रों पर नमी और पानी से संबंधित प्रभावों का उल्लेख मिलता है। पानी के आवागमन से घुलनशील लवणों का जमाव और नमी में बदलाव चित्रित सतह के लिए दीर्घकालिक संरक्षण चुनौती बन सकते हैं।
यानी आज का रिसाव और तत्काल नुकसान दो अलग बातें हैं, लेकिन लगातार या अनियंत्रित नमी लंबे समय में किसी भी प्राचीन भित्तिचित्र के लिए संरक्षण संबंधी चुनौती बन सकती है।
वायरल वीडियो में सबसे ज्यादा ध्यान बाल्टियों पर गया। लेकिन ASI के अनुसार उनका इस्तेमाल केवल पानी जमा करने के लिए नहीं किया जा रहा।
गुफाओं के फर्श पर पानी फैलने से पर्यटकों के फिसलने का खतरा पैदा हो सकता है। इसलिए रिसाव वाले स्थान के नीचे बाल्टी रखकर पानी को एक जगह जमा किया जाता है। इससे फर्श पर पानी फैलने और पर्यटकों के लिए दुर्घटना का जोखिम कम होता है। यानी मौजूदा व्यवस्था को ASI ने एहतियाती सुरक्षा उपाय बताया है।
अजंता में पानी के रिसाव को रोकने और नियंत्रित करने के लिए समय-समय पर विभिन्न संरक्षण उपाय किए गए हैं।
2007 में केंद्र सरकार ने लोकसभा में बताया था कि अजंता की चित्रकारी के संरक्षण के लिए नियमित संरक्षण, निगरानी और रखरखाव के साथ-साथ गुफाओं में पानी के रिसाव को कम करने के उपाय किए जा रहे थे। इसके लिए सतह पर जल निकासी व्यवस्था विकसित करने और भू-तकनीकी अध्ययन कराने की बात भी कही गई थी।
पुराने संरक्षण कार्यों में गुफाओं के ऊपर जल निकासी व्यवस्था विकसित करने जैसे उपाय शामिल रहे हैं। 2009 की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि गुफा संख्या 16 और 17 के ऊपर अतिरिक्त कंटूर ड्रेन बनाए जाने से कुछ हिस्सों में अंदरूनी रिसाव को रोकने में मदद मिली थी।
इससे पता चलता है कि समस्या को केवल बाल्टियां रखकर छोड़ देना ASI की पूरी संरक्षण रणनीति नहीं रही है। जल निकासी और भू-तकनीकी स्तर पर भी इसके समाधान पर काम किया जाता रहा है।
अजंता सिर्फ चट्टानों को काटकर बनाई गई गुफाओं का समूह नहीं है। यह भारतीय बौद्ध कला, वास्तुकला और चित्रकला की सबसे महत्वपूर्ण विरासतों में से एक है।
UNESCO के अनुसार अजंता में बौद्ध परंपराओं से जुड़े स्थापत्य रूपों, मूर्तियों और चित्रित पैनलों का असाधारण संग्रह है। यहां की गुफाएं मुख्य रूप से बौद्ध चैत्यगृहों और विहारों के रूप में विकसित हुईं और इनकी दीवारों पर बौद्ध कथाओं तथा परंपराओं से जुड़े चित्र बनाए गए हैं।
अजंता की सबसे बड़ी खासियत इसकी भित्तिचित्र कला है। इन चित्रों में बुद्ध के जीवन, जातक कथाओं और बौद्ध परंपरा से जुड़े अनेक प्रसंगों को चित्रित किया गया है।
इसी कारण यहां पानी, नमी, तापमान, पर्यटकों की संख्या और संरचनात्मक स्थिरता जैसी छोटी दिखने वाली समस्याएं भी संरक्षण के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण हो जाती हैं।
फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर घबराने की जरूरत नहीं है, क्योंकि ASI ने स्पष्ट किया है कि मौजूदा रिसाव से चित्रों और मूर्तियों को कोई खतरा नहीं है।
लेकिन वायरल वीडियो ने एक महत्वपूर्ण सवाल जरूर सामने ला दिया है इतनी महत्वपूर्ण विश्व धरोहर के लिए मानसून के पानी का स्थायी और वैज्ञानिक समाधान कितना प्रभावी है?
यही वह सवाल है जिस पर आगे भी निगरानी जरूरी होगी। क्योंकि बाल्टी तत्काल पानी रोक सकती है, पर्यटकों को फिसलने से बचा सकती है और रिसाव का पानी जमा कर सकती है, लेकिन किसी विश्व धरोहर स्थल के संरक्षण की अंतिम चुनौती इससे कहीं बड़ी होती है।
अजंता के संरक्षण की चुनौती केवल पानी के रिसाव तक सीमित नहीं है। UNESCO ने इसके संरक्षण से जुड़े मुद्दों में पर्यटकों का दबाव, स्थल का प्रबंधन और गुफाओं की संरचनात्मक स्थिरता जैसे विषयों को भी चिन्हित किया है।
गुफाओं के भीतर नमी का स्तर, पर्यटकों की आवाजाही और पर्यावरणीय बदलाव भी प्राचीन चित्रों के संरक्षण को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए अजंता जैसे स्थल पर संरक्षण का मतलब सिर्फ दीवारों पर मौजूद चित्रों की मरम्मत करना नहीं, बल्कि पूरे प्राकृतिक और संरचनात्मक वातावरण को नियंत्रित रखना है।