Wardha River Sand Mining: कभी स्वच्छ जल, निर्बाध प्रवाह और समृद्ध जैव विविधता के लिए पहचानी जाने वाली जिले की नदियां आज अंधाधुंध रेत उत्खनन के कारण बदहाल होती जा रही हैं। पूर्णा, वर्धा, पेढी, चंद्रभागा, शहानूर और सिपना जैसी नदियों में बढ़ते रेत दोहन ने पर्यावरणीय संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।
जिले की जीवनरेखा मानी जाने वाली पूर्णा नदी जहां बड़े भूभाग को जल उपलब्ध कराती है, वहीं वर्धा नदी पूर्वी क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण जलस्रोत है। पेढी, चंद्रभागा और शहानूर जैसी सहायक नदियां भूजल पुनर्भरण में अहम भूमिका निभाती हैं। लेकिन लगातार हो रहे रेत उत्खनन से इन नदियों की प्राकृतिक संरचना तेजी से बदल रही है। जानकारी के अनुसार जिले में पर्यावरणीय मंजूरी प्राप्त 53 रेत घाट हैं, जिनमें से 33 घाटों को नीलाम किया जा चुका है।
इसके बाद कई नदी क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर खुदाई देखने को मिली है। अनेक स्थानों पर नदी तल में 10 से 20 फीट गहरे गड्ढे बन गए हैं और कुछ जगहों पर नदियों के प्राकृतिक प्रवाह मार्ग भी बदल गए हैं। कई लोगों का मानना है कि नदी तल में मौजूद रेत की परत वर्षा जल को जमीन में समाने में मदद करती है। इसके हटने से भूजल पुनर्भरण प्रभावित हो रहा है, जिससे कुओं, बोरवेल और अन्य जलस्रोतों का जलस्तर लगातार घट रहा है। साथ ही नदी किनारों का कटाव बढ़ने और बरसात में उनके धंसने का खतरा भी बढ़ गया है।
रेत उत्खनन का असर केवल जल संसाधनों तक सीमित नहीं है। इससे मछलियों, जलचर जीवों और पक्षियों के प्राकृतिक आवास भी प्रभावित हो रहे हैं। पर्यावरणविदों ने चेतावनी दी है कि यदि वैज्ञानिक तरीके से रेत उत्खनन, नियमित निगरानी और अवैध खनन पर कठोर कार्रवाई नहीं की गई, तो भविष्य में जिले को गंभीर जल संकट और पर्यावरणीय असंतुलन का सामना करना पड़ सकता है।
पर्यावरण प्रेमी निलेश कांचनपुरे ने कहा कि वैज्ञानिक तरीके से रेत उत्खनन, नियमित निरीक्षण, जीपीएस आधारित निगरानी व्यवस्था तथा अवैध खनन के खिलाफ सख्त कार्रवाई किए जाने पर नदियों के पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखा जा सकता है। प्रभावी नियंत्रण और सतत निगरानी से जल संसाधनों एवं जैव विविधता की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।