Industrial Projects Stuck In Ujjain After Tender Process: धार्मिक नगरी उज्जैन में होने वाले सिंहस्थ 2028 की तैयारियों के बीच प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। आरोप है कि मध्यप्रदेश औद्योगिक विकास निगम (एमपीआईडीसी) में कथित लालफीताशाही और कमीशनखोरी के चलते सैकड़ों करोड़ रुपये की औद्योगिक परियोजनाएं महीनों तक अटकी रहीं।
निर्माण एजेंसियों का दावा है कि नियमानुसार टेंडर आवंटित होने के बावजूद तकनीकी स्वीकृति, साइट सीमांकन और अन्य जरूरी प्रक्रियाओं को आगे नहीं बढ़ाया गया। इस मामले में कंपनियों की ओर से मुख्य सचिव कार्यालय को शिकायत भी दिए जाने की बात सामने आई है।
शिकायत से जुड़े आरोपों के मुताबिक, नीमच के चीताखेड़ा औद्योगिक पार्क और मंदसौर के बसई औद्योगिक पार्क में टेंडर प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी करीब छह महीने से एक साल तक सीमांकन और स्वीकृतियां लंबित रखी गईं। आरोप है कि निर्माण एजेंसियों से कथित तौर पर कमीशन की मांग की गई और मांग पूरी नहीं होने के कारण फाइलों को आगे नहीं बढ़ाया गया। इसके अलावा रनिंग बिलों का भुगतान समय पर नहीं होने से ठेकेदारों की बड़ी रकम अटक गई और कई जगह निर्माण कार्य प्रभावित हुआ। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है।
मामले में एमपीआईडीसी के कार्यकारी निदेशक राजेश राठौर की कार्यशैली को लेकर भी शिकायत में गंभीर आरोप लगाए गए हैं। शिकायतकर्ताओं ने सवाल उठाया है कि यदि टेंडर नियमानुसार आवंटित हो चुके थे तो उनके बाद की प्रक्रियाओं में इतनी लंबी देरी क्यों हुई। साथ ही यह भी पूछा गया है कि देरी के कारण परियोजनाओं की लागत बढ़ने पर इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी। शिकायत के बाद मुख्य सचिव कार्यालय स्तर पर मामले को लेकर हलचल बढ़ने की बात सामने आई है। अब जांच और संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
मामला सामने आने के बाद एमपीआईडीसी के एमडी चंद्रमौलि शुक्ला की ओर से दो अटकी परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के निर्देश दिए जाने की जानकारी है। हालांकि, अब सबसे बड़ा सवाल इनके समय पर पूरा होने का है। देरी के कारण निर्माण लागत बढ़ने के साथ पर्यावरणीय और बजटीय नुकसान की आशंका भी जताई जा रही है। मानसून और पौधरोपण का महत्वपूर्ण समय निकलने से परियोजनाओं की समयसीमा प्रभावित हुई है। ऐसे में सवाल यह है कि टेंडर के बाद काम रोकने की वजह प्रशासनिक लापरवाही थी या कुछ और। सरकार से अब पूरे मामले की पारदर्शी जांच, जिम्मेदारी तय करने और दोष साबित होने पर कार्रवाई की मांग उठ रही है। सिंहस्थ 2028 को देखते हुए इन परियोजनाओं की समयबद्ध निगरानी भी महत्वपूर्ण होगी।