Shankaracharya Narendranand Saraswati Statement: धार स्थित भोजशाला को लेकर चल रही बहस के बीच सुमेरु पीठ के शंकराचार्य नरेंद्रानंद सरस्वती ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि भोजशाला महाराज भोज द्वारा स्थापित एक प्राचीन गुरुकुल और शिक्षा केंद्र था, जहां 64 विद्याओं और 64 कलाओं का शिक्षण होता था तथा इसकी आराध्या भगवती सरस्वती थीं।
शंकराचार्य नरेंद्रानंद सरस्वती ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट इंदौर बेंच के फैसले का स्वागत करते हुए इसे “आस्था, श्रद्धा और भक्ति की विजय” बताया। उन्होंने कहा कि एक समय ऐसा था जब श्रद्धालुओं को दर्शन और हवन के लिए लाठियां खानी पड़ती थीं, लेकिन समय बदला है और अब उन पर पुष्प वर्षा हो रही है।
शंकराचार्य नरेंद्रानंद सरस्वती ने साफ कहा कि भोजशाला को उसका पुराना गौरव, सम्मान और स्वाभिमान वापस मिलना चाहिए। उन्होंने मांग उठाई कि मां सरस्वती की प्रतिमा को ब्रिटिश म्यूजियम से वापस भारत लाकर धार भोजशाला में स्थापित किया जाए। शंकराचार्य ने कहा कि यह केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और विरासत से जुड़ा मामला है। उन्होंने भोजशाला में दोबारा गुरुकुल परंपरा शुरू करने की भी वकालत की, ताकि यह स्थान शिक्षा, संस्कृति और सनातन परंपरा का प्रमुख केंद्र बन सके।
शंकराचार्य नरेंद्रानंद सरस्वती ने कहा कि देश के कई धार्मिक स्थलों पर हिंदू देवी-देवताओं से जुड़े प्रमाण मौजूद हैं। उनका कहना है कि जिन स्थानों को लेकर विवाद की स्थिति है, वहां निष्पक्ष सर्वे और जांच कराई जानी चाहिए, जिससे वास्तविक तथ्य सामने आ सकें। उन्होंने कहा कि सत्य उजागर होना जरूरी है और इसके लिए कानूनी व संवैधानिक प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए। इस दौरान अजमेर शरीफ दरगाह को लेकर सोशल मीडिया पर वायरल दावों पर भी उन्होंने प्रतिक्रिया दी और कहा कि किसी भी निष्कर्ष पर तथ्यों के आधार पर ही पहुंचना चाहिए।
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उन्होंने साफ कहा कि आधुनिक तकनीक और मशीनों के माध्यम से जांच कर सच्चाई सामने लाई जानी चाहिए, जिससे 'दूध का दूध और पानी का पानी' हो सके। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि देश की एकता, अखंडता और शांति बनाए रखना सबसे जरूरी है।