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खंडवा में रावण के पुतले बनाने पर महंगाई की मार, लागत 1500 से बढ़कर 2000 रुपये के पार।
बांस की कमी से रावण बनाने वाले कारीगर परेशान, वन विभाग से पहले की तरह नहीं मिल रहा बांस।
पहले सरकारी दर पर 20 से 30 रुपये में मिलता था बांस, अब बाजार में 200 रुपये से अधिक कीमत चुकानी पड़ रही।
कारीगरों ने वन विभाग से उचित दर पर बांस उपलब्ध कराने की मांग की।
Dussehra 2026 : विजयादशमी पर बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक रावण दहन की तैयारियां शुरू हो गई हैं। शहर में चार स्थानों पर बड़े आयोजन होंगे, वहीं मोहल्लों में भी बच्चे रावण दहन करेंगे। लेकिन इस बार रावण के पुतले तैयार करना कारीगरों के लिए महंगा साबित हो रहा है।
बांस की कमी और उसकी बढ़ती कीमतों के कारण पुतले बनाने की लागत में इजाफा हुआ है। इसका सीधा असर कारीगरों के काम पर पड़ रहा है।
खंडवा के कहारवाड़ी स्थित झमराल मोहल्ले में रावण बनाने वाले कारीगर कमलचंद ढाकसे के मुताबिक पहले 10 से 12 फीट ऊंचाई का रावण करीब 1500 रुपये में तैयार हो जाता था। लेकिन अब इसकी लागत बढ़कर 2000 रुपये से अधिक हो गई है। कारीगरों के सामने कच्चे माल की व्यवस्था करना बड़ी चुनौती बन गया है। बढ़ती लागत के कारण पुतले तैयार करने का काम पहले की तुलना में मुश्किल हो गया है।
कारीगर कमलचंद ढाकसे ने बताया कि पहले वन विभाग के माध्यम से बांस आसानी से उपलब्ध हो जाता था। सरकारी दर पर 20 से 30 रुपये में बांस मिल जाता था, जिससे रावण के पुतले तैयार करने में कम खर्च आता था। लेकिन ठेकेदारी प्रथा शुरू होने के बाद कारीगरों को पहले की तरह बांस मिलना मुश्किल हो गया है। अब उन्हें अपनी जरूरत पूरी करने के लिए बाजार का सहारा लेना पड़ रहा है।
बांस की उपलब्धता कम होने के कारण अब कारीगरों को बाजार से इसे खरीदना पड़ रहा है। यहां एक बांस के लिए 200 रुपये से अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है। इससे पुतले बनाने की कुल लागत बढ़ गई है। पहले कम खर्च में तैयार होने वाले रावण के लिए अब ज्यादा पूंजी लगानी पड़ रही है। ऐसे में छोटे स्तर पर काम करने वाले कारीगरों की परेशानी बढ़ गई है।
बांस की कमी और बढ़ती लागत का असर रावण बनाने की संख्या पर भी पड़ा है। कमलचंद ढाकसे के अनुसार, इस बार वे अब तक केवल 10 से 12 रावण ही तैयार कर पाए हैं। कारीगरों का कहना है कि यदि वन विभाग की ओर से पहले की तरह बांस उपलब्ध कराया जाए, तो उनकी लागत कम हो सकती है और काम को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी।
खंडवा जिले में रावण के पुतले तैयार करना केवल रोजगार ही नहीं, बल्कि दशहरे की परंपरा से जुड़ा काम भी है। कारीगर चाहते हैं कि उन्हें उचित दर पर बांस उपलब्ध हो, ताकि बढ़ती महंगाई के बीच यह परंपरागत काम जारी रखा जा सके। अब देखना होगा कि बांस की उपलब्धता को लेकर उनकी परेशानी दूर करने के लिए कोई कदम उठाया जाता है या नहीं।