Indore Anant Chaturdashi Jhanki : इंदौर की अनंत चतुर्दशी और झांकियां शहर की धार्मिक परंपरा के साथ-साथ उसकी सांस्कृतिक पहचान का भी हिस्सा हैं। सार्वजनिक गणेश उत्सव की शुरुआत 1908 के आसपास मानी जाती है। इसी दौर में कपड़ा मिलों में काम करने वाले मजदूरों ने झांकियां निकालने की परंपरा को आकार दिया। हुकुमचंद मिल से निकलने वाली शुरुआती झांकियों से शुरू हुआ यह सिलसिला आगे चलकर इंदौर की खास पहचान बन गया।
झांकियों के शुरुआती दौर में इन्हें दिन में निकाला जाता था और रात में रोशनी के लिए गैस बत्तियों का इस्तेमाल होता था। इसके बाद बिजली के बल्ब आए और फिर जनरेटर ने झांकियों को रोशन करना शुरू किया। पहले अलग-अलग तरह की गाड़ियों पर झांकियां लाई जाती थीं, लेकिन अब बड़े वाहनों पर ही विशाल झांकियों का निर्माण किया जाता है। तकनीक बढ़ने के साथ चलित पुतले, मोटर, मशीन और आकर्षक लाइटिंग भी इनका हिस्सा बन गए।
झांकी निर्माता असलम बताते हैं कि झांकी बनाने की कला उन्हें उनके पिता से विरासत में मिली। बचपन में वह पिता को झांकी बनाते हुए देखते थे और धीरे-धीरे खुद इस कला में माहिर हुए। उनके लिए झांकी निर्माण सिर्फ रोजी-रोटी का जरिया नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही जिम्मेदारी है। मिलों के दौर में लकड़ी, लोहा और दूसरी सामग्री मिल परिसर से ही आसानी से मिल जाती थी, लेकिन मिलें बंद होने के बाद अब कारीगरों को अधिकांश सामान बाजार से खरीदना पड़ता है।
समय के साथ झांकियों में तकनीकी प्रयोग लगातार बढ़े हैं। चलित पुतलों से लेकर मोटर, मशीन, इलेक्ट्रिकल उपकरण और आधुनिक लाइटिंग तक का इस्तेमाल होने लगा है। इससे झांकियां पहले के मुकाबले ज्यादा आकर्षक हुई हैं, लेकिन निर्माण की लागत भी बढ़ी है। महंगे उपकरणों और सामग्री के बावजूद कारीगर हर साल कुछ नया करने की कोशिश करते हैं।
झांकियों की परंपरा को लंबे समय से देखते आ रहे महेश गौहर बताते हैं कि पहले इनमें मिल मजदूरों की मेहनत और हाथों का हुनर साफ दिखाई देता था। समय के साथ मिलें बंद हो गईं और तकनीक ने झांकियों का स्वरूप बदल दिया, लेकिन लोगों का उत्साह कायम रहा। अब झांकियों में धार्मिक कथाओं के साथ सामाजिक संदेश, देशभक्ति, राष्ट्रीय सुरक्षा और समसामयिक मुद्दों को भी जगह मिलती है।
1909 के आसपास इंदौर जिले में कपड़ा मिल उद्योग के विस्तार के साथ शहर का आर्थिक और सामाजिक जीवन भी बदला। इसी दौर में मिल मजदूरों की सक्रिय भागीदारी से झांकियों का कारवां बड़ा होता गया। शुरुआत में धार्मिक विषयों पर केंद्रित झांकियां बाद में सामाजिक और राष्ट्रीय मुद्दों को भी अपने भीतर समेटने लगीं। यही बदलाव इन्हें शहर के सांस्कृतिक जीवन का अहम हिस्सा बनाता गया।
अनंत चतुर्दशी के अवसर पर 25 सितंबर को इंदौर एक बार फिर झांकियों की रोशनी से जगमगाएगा। शाम करीब 9 बजे शुरू होने वाला झांकियों का सिलसिला देर रात तक चलेगा और सुबह 3 से 4 बजे तक जारी रहने की उम्मीद है। झांकियों को देखने के लिए इंदौर के अलावा आसपास के क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में लोग शहर पहुंचेंगे।
इस बार कल्याण मिल की झांकी में नारी शक्ति और देश की सुरक्षा में महिलाओं की भूमिका को प्रमुखता से दिखाया जाएगा। यह झांकी भी इस परंपरा के बदलते स्वरूप को दर्शाएगी, जहां मनोरंजन और धार्मिक विषयों के साथ सामाजिक और राष्ट्रीय संदेशों को प्रमुखता दी जा रही है।
गैस की बत्तियों से शुरू हुआ झांकियों का सफर आज आधुनिक मशीनों, मोटरों और रोशनी तक पहुंच चुका है। मिलों का दौर भले खत्म हो गया हो, लेकिन मिल मजदूरों से विरासत में मिला हुनर आज भी इन झांकियों में नजर आता है। गणेश उत्सव के दौरान इंदौर की झांकियों में रंग और रोशनी के साथ एक सदी से ज्यादा पुराना इतिहास, कारीगरों की मेहनत और शहर की सांस्कृतिक स्मृति भी साथ चलती है।