Indore Bhagirathpura Water Tragedy: करीब आठ महीने पहले सामने आए इंदौर के भागीरथपुरा दूषित पानी कांड को लेकर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ में शनिवार को अहम घटनाक्रम सामने आया। एक सदस्यीय जांच आयोग की रिपोर्ट कोर्ट में पेश होने के बाद से बंद लिफाफे में है, लेकिन सुनवाई के दौरान रिपोर्ट के मुख्य अंश सभी याचिकाकर्ताओं को दिखाए गए। रिपोर्ट में दूषित पानी से बीमार होकर 22 लोगों की मौत होने का उल्लेख सामने आया है। हालांकि, जिला प्रशासन हादसे में अब तक 36 मौतों की पुष्टि कर चुका है। वहीं रिपोर्ट में जनप्रतिनिधियों की जगह अधिकारियों पर पूरा दोष बताया गया है।
सूत्रों के अनुसार जांच आयोग की रिपोर्ट के सामने आए अंशों के मुताबिक, भागीरथपुरा दूषित पानी कांड में जनप्रतिनिधियों को दोषमुक्त किए जाने की बात सामने आई है, जबकि मामले में जिम्मेदारी अधिकारियों की ओर तय किए जाने के संकेत हैं। रिपोर्ट में नगर निगम के जल यांत्रिकी विभाग से जुड़े अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं।
याचिकाकर्ता और हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष एवं सीनियर एडवोकेट रितेश ईनाणी ने रिपोर्ट में सामने आए तथ्यों को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि मामले की पूरी रिपोर्ट सार्वजनिक होना जरूरी है, ताकि स्पष्ट हो सके कि किन लोगों की मौत को दूषित पानी कांड से जोड़ा गया और किन्हें जांच के दायरे से बाहर रखा गया।
रितेश ईनाणी के मुताबिक, भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पानी के कारण 39 से अधिक लोगों की मौत हुई है। ऐसे में जांच आयोग की रिपोर्ट में केवल 22 मौतों का उल्लेख होना कई सवाल खड़े करता है।
वहीं, जिला प्रशासन की ओर से अब तक 36 मौतों की पुष्टि की जा चुकी है। ऐसे में आयोग की रिपोर्ट, प्रशासनिक आंकड़ों और याचिकाकर्ताओं के दावों के बीच अंतर को लेकर अब न्यायालय में स्थिति स्पष्ट होने का इंतजार है।
याचिकाकर्ता के अनुसार, जांच रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि नगर निगम के जल यांत्रिकी विभाग के अधिकारियों को क्षेत्र में दूषित पानी की समस्या की जानकारी करीब दो साल पहले ही हो गई थी। बताया गया है कि अधिकारियों को यह जानकारी भी थी कि क्षेत्र में दूषित पानी सप्लाई हो रहा है। इसी आधार पर नई पाइपलाइन डालने के लिए टेंडर जारी किए जाने की बात भी सामने आई है। आरोप है कि समय रहते प्रभावी कार्रवाई नहीं होने के कारण स्थिति गंभीर होती गई और बाद में बड़ा हादसा सामने आया।
जांच रिपोर्ट में सेवानिवृत्त न्यायाधीश सुशील कुमार गुप्ता की ओर से पीड़ित परिवारों को 20 लाख रुपये मुआवजा दिए जाने की बात भी सामने आई है। दूसरी ओर, जिला प्रशासन द्वारा पीड़ित परिवारों को अब तक 2 लाख रुपये की सहायता राशि दिए जाने की जानकारी है। मुआवजे की प्रस्तावित और दी गई राशि के बीच बड़ा अंतर भी अब चर्चा का विषय बन गया है।
सीनियर एडवोकेट रितेश ईनाणी ने हाई कोर्ट से मांग की है कि जांच आयोग की पूरी रिपोर्ट सभी पक्षों के सामने रखी जाए और इसे सार्वजनिक किया जाए। उनका कहना है कि यह मामला केवल किसी एक परिवार या व्यक्ति से जुड़ा नहीं है, बल्कि पूरे शहर के जनहित से जुड़ा हुआ है। उन्होंने अदालती कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग दोबारा शुरू करने की मांग भी की है, ताकि प्रभावित परिवार और आम नागरिक मामले की सुनवाई को पारदर्शी तरीके से देख सकें।
फिलहाल जांच आयोग की रिपोर्ट बंद लिफाफे में है और रिपोर्ट के मुख्य अंश सामने आने के बाद मौतों के आंकड़े, अधिकारियों की जिम्मेदारी, जनप्रतिनिधियों को दोषमुक्त किए जाने और मुआवजे की सिफारिश को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं। अब इंदौर हाई कोर्ट में रिपोर्ट के तथ्यों पर आगे होने वाली सुनवाई के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि भागीरथपुरा दूषित पानी कांड में किसकी जिम्मेदारी तय होती है और पीड़ित परिवारों को मुआवजे के मामले में क्या राहत मिलती है।