Indian Constitution Original Copy: भारत इस साल अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मनाने जा रहा है। ऐसे में देश की आजादी और लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी पहचान भारतीय संविधान से जुड़ी एक बेहद खास जानकारी सामने आती है। आमतौर पर लोगों को लगता है कि संविधान की मूल प्रति सिर्फ संसद भवन में सुरक्षित है, लेकिन मध्य प्रदेश के ग्वालियर में भी इसकी एक दुर्लभ मूल प्रति संरक्षित है। ग्वालियर के महाराज बाड़ा स्थित केंद्रीय पुस्तकालय में रखी यह ऐतिहासिक प्रति पूरी तरह हस्तलिखित है और अपनी खूबसूरत सजावट के लिए भी खास पहचान रखती है।
इसकी पांडुलिपि में संविधान सभा के सदस्यों के मूल हस्ताक्षर मौजूद हैं, जिनमें डॉ. राजेंद्र प्रसाद, डॉ. भीमराव आंबेडकर, पंडित जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे प्रमुख नेताओं के हस्ताक्षर भी शामिल हैं। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, संविधान की ऐसी मूल प्रतियां देश के अलग-अलग हिस्सों में भेजी गई थीं और ग्वालियर को भी इनमें से एक प्रति मिली थी।
मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर के महाराज बाड़ा स्थित केंद्रीय पुस्तकालय में भारतीय संविधान की एक दुर्लभ मूल प्रति आज भी सुरक्षित रखी गई है। यह प्रति खास राष्ट्रीय अवसरों पर आम लोगों के लिए प्रदर्शित की जाती है। स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस और संविधान दिवस जैसे मौकों पर इसे देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग पुस्तकालय पहुंचते हैं।
ग्वालियर के लिए यह प्रति केवल एक ऐतिहासिक दस्तावेज नहीं, बल्कि शहर की एक महत्वपूर्ण धरोहर भी है। संविधान की इस प्रति की मौजूदगी ग्वालियर को देश के उन चुनिंदा स्थानों में शामिल करती है, जहां संविधान की मूल प्रतियों में से एक को संरक्षित रखा गया है।
ग्वालियर की केंद्रीय लाइब्रेरी में रखी संविधान की इस प्रति के यहां पहुंचने की कहानी भी काफी खास है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, संविधान की मूल प्रतियां तैयार होने के बाद उनमें से कुछ प्रतियां देश के अलग-अलग हिस्सों में भेजने का फैसला किया गया था, ताकि लोग अपने संविधान को करीब से देख सकें और उससे जुड़ाव महसूस कर सकें।
इसी क्रम में एक प्रति ग्वालियर पहुंची। रिपोर्टों के अनुसार, ग्वालियर में सुरक्षित यह प्रति 31 मार्च 1956 को केंद्रीय पुस्तकालय में लाई गई थी। इससे पहले ग्वालियर की यह लाइब्रेरी सिंधिया राजवंश से जुड़ी रही थी। 1927 में इसकी स्थापना मोती महल में ‘आलीजा बहादुर लाइब्रेरी’ के रूप में हुई थी। बाद में इसे महाराज बाड़ा स्थित भवन में स्थानांतरित किया गया और स्वतंत्रता के बाद इसका नाम संभागीय केंद्रीय पुस्तकालय रखा गया।
ग्वालियर में सुरक्षित संविधान की प्रति सामान्य छपी हुई किताब जैसी नहीं है। रिपोर्टों के अनुसार, इसे हाथ से लिखा गया था और इसकी सुंदरता बढ़ाने के लिए विशेष कैलीग्राफी का इस्तेमाल किया गया। इसके पन्नों की सजावट में सोने का काम भी किया गया है।
पहले पन्ने पर विशेष रूप से स्वर्ण सज्जा दिखाई देती है, जबकि पन्नों की बॉर्डर और अन्य सजावटी हिस्सों में भी सोने की पॉलिश और नक्काशी का उल्लेख मिलता है। संविधान के अलग-अलग हिस्सों में भारत के प्राचीन इतिहास और सांस्कृतिक विरासत से जुड़े चित्रों और प्रतीकों का इस्तेमाल भी इस प्रति को दूसरी प्रतियों से अलग पहचान देता है।
बता दे किं संविधान की यह प्रति बेहद पुरानी और ऐतिहासिक होने के कारण इसकी सुरक्षा और संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जाता है। पुराने समय में इसे सुरक्षित बॉक्स में रखा जाता था और आम लोगों को विशेष अवसरों पर ही इसे देखने का मौका मिलता था। अब लोगों की सुविधा के लिए इसकी डिजिटल प्रति भी उपलब्ध कराई जाती है।
राष्ट्रीय पर्वों के दौरान जब मूल प्रति को प्रदर्शित किया जाता है, तब बड़ी संख्या में छात्र, युवा और आम नागरिक इसे देखने पहुंचते हैं। संविधान के मूल दस्तावेज को सामने देखकर लोगों में इतिहास और लोकतांत्रिक व्यवस्था को लेकर जिज्ञासा के साथ-साथ गर्व की भावना भी देखने को मिलती है।
हर साल स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस और संविधान दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्वों के मौके पर देशभर में स्वतंत्रता दिवस का उत्साह देखने को मिलता है। इसी दौरान ग्वालियर की केंद्रीय लाइब्रेरी में सुरक्षित संविधान की मूल प्रति भी लोगों के आकर्षण का केंद्र बनती है। खासकर युवाओं और छात्रों के लिए यह अपने संविधान के इतिहास को करीब से समझने का अवसर होता है।
भारत के स्वतंत्र होने के बाद जिस संविधान ने देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को दिशा दी, उसकी दुर्लभ मूल प्रति का ग्वालियर में सुरक्षित होना शहर के लिए गौरव की बात है। सोने से सजे पन्ने, संविधान सभा के सदस्यों के मूल हस्ताक्षर और ऐतिहासिक चित्र इस दस्तावेज को सिर्फ एक किताब नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की जीवंत विरासत बनाते हैं।