नेत्रहीन व्यक्ति की जमीन पर सरकारी निर्माण (सोर्स- सोशल मीडिया)) 
गुना

अंधा कानून या सिस्टम की बेरहमी? नेत्रहीन युवक की जमीन पर सरकार ने बना दिए अस्पताल-स्कूल, जानें पूरा मामला

MP News: मध्य प्रदेश के गुना से एक ऐसी खबर निकल कर आई है, जिसने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दरअसल, एक नेत्रहीन व्यक्ति की जमीन पर सरकारी निर्माण कर दिया गया।

सजल रघुवंशी

Guna News: मंगलवार को जिला कलेक्टोरेट में आयोजित जनसुनवाई में एक नेत्रहीन युवक अपने बुजुर्ग पिता की विरासत और अपने हक की लड़ाई लड़ने के लिए कलेक्ट्रेट की चौखट पर पहुंचा। राघौगढ़ तहसील के विजयपुर निवासी पप्पू प्रजापति ने नम आंखों से अपनी व्यथा सुनाई कि किस तरह उसकी करीब पौने तीन बीघा जमीन पर कहीं सरकारी इमारतें तन गई हैं, तो कहीं रसूखदारों ने कब्जा कर लिया है।

फरियादी पप्पू प्रजापति ने बताया कि ग्राम विजयपुर (तहसील राघौगढ़) में उनके पिता स्व. कैलाश नारायण कुम्हार के नाम पर वर्ष 1984 में सर्वे क्रमांक 685/1, रकबा 0.651 हेक्टेयर का पट्टा जारी हुआ था। पप्पू के अनुसार, उनके पिता मानसिक रूप से अस्वस्थ थे, जिसका फायदा उठाकर वे कभी अपनी जमीन पर काबिज नहीं हो पाए। पिता की मृत्यु के बाद पप्पू और उनकी मां धप्पो बाई के नाम फौती नामांतरण तो हो गया, लेकिन आज तक उन्हें जमीन का कब्जा नहीं मिला।

कुछ जमीन पर रसूखदारों ने किया कब्जा

अपनी दोनों आंखों की रोशनी खो चुके पप्पू ने बताया कि जिस जमीन के लिए वह दर-दर की ठोकरें खा रहा है, उस पर वर्तमान में शासकीय स्कूल, अस्पताल और नगरपालिका की पानी की टंकी का निर्माण हो चुका है। रही-सही कसर रसूखदारों ने पूरी कर दी। पीड़ित का आरोप है कि गांव के ही पुरुषोत्तम धाकड़ और अन्य लोगों ने षडयंत्रपूर्वक जमीन पर कब्जा कर लिया और बाड़ा बनाकर पशुपालन कर रहे हैं।

'झोपड़ी में रहने को मजबूर'

नेत्रहीन पीड़ित ने रुआंसे स्वर में कहा कि साहब, मैं देख नहीं सकता इसलिए हर बार किसी न किसी के सहारे यहां आता हूँ। पिछली बार भी आश्वासन मिला था लेकिन कुछ नहीं बदला। मैं आज एक छोटी सी झोपड़ी में रहने को मजबूर हूं और मांगकर पेट पाल रहा हूं।

प्रशासन से की यह मांग

जनसुनवाई में दिए आवेदन में पप्पू ने मांग की है कि चूंकि उसकी पैतृक भूमि पर अब सरकारी निर्माण हो चुके हैं इसलिए उसे या तो उतनी ही जमीन किसी दूसरी जगह आवंटित की जाए, या फिर उचित मुआवजा दिया जाए ताकि वह अपना जीवन यापन कर सके। पीड़ित ने तहसीलदार से लेकर कलेक्टर तक कई बार गुहार लगाई है। अब इस मामले ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। सोचिए किसी की निजी जमीन पर भला सरकार कैसे निर्माण कर सकती है।

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