World Bicycle Day 2026: आज पूरी दुनिया विश्व साइकिल दिवस मना रहा है। इसी साइकिल को लेने के लिए बचपन में न जाने मम्मी-पापा से कितनी जिद की थी। अब जवानी में इसे चलाकर कैलोरी बर्न की जा रही है और बुढ़ापे में नाती-पोतों को उससे प्रेम करना सिखाया जा रहा है, लेकिन आज यही साइकिल सड़कों से गायब हो चुकी है और हम सब को विश्व साइकिल दिवस मनाने की जरूरत पड़ रही है।
अप्रैल 2018 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 3 जून को विश्व साइकिल दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की। साइकिल का आविष्कार तो 18वीं शताब्दी में हुआ था, पर समय और वक्त के साथ साइकिल मॉडिफाई होती गई। आज बाजार में तमाम तरह की साइकिलें मौजूद है, जिसमें रोड बाइक, टूरिंग बाइक, हार्डटेल बाइक, फुल सस्पेंशन बाइक, साइक्लोक्रॉस बाइक, फोल्डिंग बाइक आदि बाजार में मौजूद हैं। जैसी जरूरत उस हिसाब की साइकिल आप बाजार से ले सकते हैं। साइकिल में नई तकनीक का उपयोग हुआ, तो इसकी कीमतों में भी काफी वृद्धि हुई।
एक समय किसी के पास साइकिल होना बहुत बड़ी बात थी। विवाह में दहेज में साइकिल देने का चलन था। जब भी कोई साइकिल खरीद कर लाता था, तो आसपास के गांव के लोग साइकिल को देखने आते थे और अचरज करते थे। किसी समय साइकिल होना गर्व की बात होती थी।
लगभग 126 साल पहले इंदौर में परिवहन विभाग द्वारा साइकिल चलाने के लिए भी लाइसेंस जारी किए जाते थे। नगर निगम साइकिल पर कर निर्धारित करती थी। 1958 के नगर निगम चुनाव में नागरिक मोर्चे की जीत इसी मुद्दे पर हुई थी कि साइकिल पर लगाया जाने वाला दो रुपये का वार्षिक कर बंद करवाया जाएगा। मोर्चे की जीत होते ही साइकिल कर वापस ले लिया गया था। इंदौर के आस-पास के क्षेत्रों में कपड़ा मिलों में काम करने वाले मजदूरों के पास यातायात का मुख्य साधन साइकिल था। 1956 में इंदौर में रजिस्टर्ड साइकिल की संख्या करीब 30 हजार थी।
एक सामान्य साइकिल, जो लगभग 90-100 वर्ष पहले 10 रूपए की आती थी, अब 5 हजार में आती है। ट्रेक बटरफ्लाई मैडोने नाम की साइकिल की कीमत 3.75 करोड़ है, इसके फ्रेम में सोना लगा जड़ा हुआ है। ऐसी ही जापानी कंपनी द्वारा बनाई गई ट्रेक योशिमोटो नारा साइकिल की कीमत 1.5 करोड़ रुपए है।
भारत में साइकिल के पहियों ने देश की आर्थिक तरक्की में अहम भूमिका निभाई है। 1947 में आजादी के बाद अगले कई दशक तक देश में साइकिल, यातायात व्यवस्था का हिस्सा रही। खासतौर पर 1960 से लेकर 1990 तक भारत में ज्यादातर परिवारों के पास साइकिल थी। यह व्यक्तिगत यातायात का सबसे किफायती साधन था। गांवों में किसान साप्ताहिक मंडियों तक सब्जियों और फसलों को साइकिल से ही ले जाते थे। गांव से दूध की सप्लाई भी साइकिल से ही की जाती थी। डाक विभाग का पूरा तंत्र ही साइकिल पर निर्भर था। पोस्टमैन साइकिल से चिट्ठियां बांटते थे।
भारत में साइकिल बनाने वाली कंपनी एटलस की फैक्ट्री बंद होने से वहां काम करने वाले करीबन एक हजार लोग बेरोजगार हो गए। एटलस साइकिल कम्पनी की स्थापना 1951 में हुई थी। इसका कई विदेशी साइकिल निर्माता कंपनियों के साथ गठबंधन था। जिस कारण एटलस कम्पनी की साइकिल की गिनती दुनिया भर की श्रेष्ठ साइकिलों में होती थी। अमेरिका के बड़े-बड़े डिपार्टमेंट स्टोर में भी एटलस की साइकिलें बेची जाती थी। दुनिया की सबसे बड़ी साइकिल निर्माता कम्पनी एटलस का विश्व साइकिल दिवस के दिन ही घाटे के चलते बंद हो जाना बड़े दुर्भाग्य की बात है।
बढ़ते प्रदूषण की वजह से दुनिया के बहुत से देशों में साइकिल चलाने को बढ़ावा दिया जा रहा है। नीदरलैंड की राजधानी एम्सटर्डम में सिर्फ साइकिल चलाने की ही अनुमति है। भारत में भी दिल्ली, मुंबई, पुणे, अहमदाबाद और चंडीगढ़ में सुरक्षित साइकिल लेन का निर्माण किया गया है। उत्तर प्रदेश में भी एशिया का सबसे लंबा साइकिल हाइवे बनाया गया है, जिसकी लंबाई करीबन 200 किलोमीटर से अधिक है।