International Day of Rural Women 2026: गांव की महिलाएं अब सिर्फ घर और खेतों की जिम्मेदारियां ही नहीं संभाल रहीं, बल्कि अपने छोटे-छोटे हुनर को कमाई का जरिया बना रही हैं। कोई घर में अचार-पापड़ बनाकर बेच रही है, तो कोई सिलाई, कढ़ाई और हैंडीक्राफ्ट की चीजें बनाकर नाम कमा रही हैं। इसमें महिलाओं की मदद स्वयं सहायता समूहों और डिजिटल माध्यमों ने भी की है।
हर साल 15 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय ग्रामीण महिला दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं के योगदान को पहचानना और उनके आर्थिक व सामाजिक सशक्तीकरण पर ध्यान देना है। संयुक्त राष्ट्र ने इस की शुरुआत 2008 में की थी।
आइए जानते हैं ऐसे 5 कामों के बारे में, जिन्हें गांव की महिलाएं अपने हुनर और उपलब्ध संसाधनों के आधार पर घर से शुरू कर सकती हैं और धीरे-धीरे अपनी पहचान बना सकती हैं।
ग्रामीण इलाकों में अचार, पापड़, मसाले, बड़ी, मुरब्बे और पारंपरिक स्नैक्स बनाने का हुनर कई महिलाओं के पास होता है। अब इसी हुनर को छोटे कारोबार में बदलने का काम ग्रामीण महिलाएं कर रही है। महिलाएं घर में इन चीजों को तैयार करके आसपास के बाजारों, किराना दुकानों, स्थानीय मेलों और स्वंय सहायता समूहों तक पहुंचा कर कमाई का जरिया बना रही हैं।
अगर उत्पाद की गुणवत्ता अच्छी हो, हाइजिनिक और पैकिंग आकर्षक हो, तो ग्राहक दोबारा भी खरीदारी करते हैं। शुरुआत में एक या दो उत्पादों से काम शुरू करना और ग्राहकों की पसंद को समझकर उत्पाद को जोड़ना, फूड प्रोडक्ट को बेचने से पहले फूड सेफ्टी और रजिस्ट्रेशन संबंधी जानकारी रखना भी जरूरी है।
जिन महिलाओं को सिलाई, कढ़ाई, फॉल-पिको या कपड़ों पर सजावट का काम आता है, वे घर से ही ऑर्डर लेना शुरू करती हैं। ब्लाउज सिलना, बच्चों के कपड़े तैयार करना, सूट में कढ़ाई करना और पुराने कपड़ों ये कुछ यूजफुल बनाना।
शुरुआत आसपास की महिलाओं और परिचितों के कपड़ों के ऑर्डर से की जा सकती है। काम की तस्वीरें मोबाइल से खींचकर सोशल मीडिया पर साझा करने से नए ग्राहकों तक पहुंचा जा सकता है। समय पर डिलीवरी, सही नाप और अच्छी फिनिशिंग इस काम में भरोसा बनाने का काम करेगी।
हैंडमेड चीजें बनाने में रुचि रखने वाली महिलाएं कपड़े के थैले, जूट बैग, टोकरियां, सजावटी सामान, गुड़िया और घर की सजावट से जुड़ी वस्तुएं तैयार कर सकती हैं। स्थानीय कला और पारंपरिक डिजाइन इन उत्पादों को खास बनाते हैं।
शुरुआत में इनकी बिक्री गांव के बाजार, मेलों, प्रदर्शनियों और स्वयं सहायता समूहों के जरिए की जा सकती है। ऐसी चीजों को इंटरनेशनल मार्केट में भी बेचा जा सकता है। कुछ ग्रामीण महिला समूह प्रशिक्षण लेकर ऐसे उत्पाद बनाते और मिलकर बेचते हैं। हर महिला को अलग से मशीन या दुकान लगाने की जरूरत नहीं है, समूह में काम बांटकर उत्पादन और बिक्री की जिम्मेदारी संभाली जा सकती है।
जिन परिवारों के पास गाय या भैंस हैं, वहां दूध से जुड़े काम आय का एक जरिया बन सकते हैं। महिलाएं मांग के अनुसार पनीर, घी और खोया व मिठाइयां जैसे उत्पाद तैयार करके बेच सकती हैं। हालांकि, इसके लिए साफ-सफाई, लागत व यूनिकनेस पर ध्यान देना जरूरी है।
भारतीय कृषि अनुसंधान के एक उदाहरण में बताया गया है कि हरियाणा की ग्रामीण महिलाओं ने स्वयं सहायता समूह बनाकर दूध और उससे बने उत्पादों की बिक्री शुरू की। समूह के सदस्यों ने दूध कलेक्ट करने, उत्पाद तैयार करने, पैकिंग और हिसाब-किताब जैसी जिम्मेदारियां आपस में बांटीं।
आज ग्रामीण महिलाएं अपने बनाए उत्पाद को केवल गांव तक सीमित नहीं रखती है, बल्कि मोबाइल के जरिए डिजिटल माध्यमों तक अपनी पहुंच को बढ़ा रही हैं। स्थानीय उत्पादों की साफ तस्वीरें लेकर व्हाट्सऐप और सोशल मीडिया पर साझा करना इसकी शुरुआत हो सकती है।
इसमें उत्पाद का नाम, कीमत, आकार, उपलब्ध मात्रा और ऑर्डर देने का तरीका स्पष्ट रखना जरूरी है। धीरे-धीरे ग्राहक बढ़ने पर पैकिंग, भुगतान और डिलीवरी की व्यवस्था बेहतर की जा सकती है। इन कामों में सरकार का eSaras पोर्टल भी एक माध्यम है।
अगर किसी महिला के पास कारोबार शुरू करने के लिए पर्याप्त पूंजी या बाजार तक पहुंच नहीं है, तो वह अपने गांव के स्वयं सहायता समूह से भी जुड़ सकती हैं। दीनदयाल अंत्योदय योजना, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत महिलाओं के समूहों को प्रशिक्षण, वित्तीय मदद और आजीविका से जुड़ी गतिविधियों में सहायता देने का प्रावधान है।