Inhaled Insulin VS Injection: डायबिटीज के मरीज को जरूरत पड़ने पर इंसुलिन का इंजेक्शन लगाया जाता है, लेकिन अब एक ऐसा इंसुलिन ईजाद किया गया है, जो सांस के जरिए शरीर में जाता है और जल्दी असर करता है। इसे सोशल मीडिया पर इंसुलिन वेप कहा जाता है, लेकिन यह कोई वेपिंग डिवाइस नहीं, बल्कि इंसुलिन पाउडर देने वाला मेडिकल इनहेलर की तरह है।
इनहेल्ड इंसुलिन में इंसुलिन को इंजेक्शन की तरह त्वचा के नीचे देने के बजाय एक खास इंहेलर के जरिए फेफड़ों तक पहुंचाया जाता है। वहां से यह तेजी से ब्लड स्ट्रीम में एब्जॉर्ब होता है। इंसुलिन इंहेलर मुख्य रूप से खाने के बाद बढ़ने वाली ब्लड शुगर को कंट्रोल में करने के लिए इस्तेमाल होने वाला रैपिड एक्टिंग इंसुलिन है।
आम तौर पर लगाया जाने वाला इंसुलिन इंजेक्शन त्वचा के नीचे मौजूद फैटी टिश्यू के जरिए शरीर में पहुंचता है, जबकि इंसुलिन इंहेलर फेफड़ों के जरिए ब्लड स्ट्रीम में पहुंचता है। इसकी खासियत इसका तेजी से एब्जॉर्ब हो जाना है। इसका एक फायदा नीडल फ्री होना भी है।
इंसुलिन इंहेलर लगभग 10–15 मिनट में काम करना शुरू कर देता है, जबकि रैपिड एक्टिंग इंसुलिन को असर करने में अधिक समय लगता है। इसलिए इसे आमतौर पर भोजन से पहले इस्तेमाल किया जाता है, ताकि खाने के बाद होने वाले ब्लड शुगर स्पाइक को कंट्रोल किया जा सके।
यह बुजुर्ग मरीज, जिन्हें टाइप 1 और टाइप 2 डायबिटीज की समस्या है, उनके लिए यह अच्छा विकल्प हो सकता है। खासकर उन लोगों के लिए जिन्हें रोजाना इंसुलिन का इंजेक्शन लेने में समस्या होती है। इसे शुरू करने से पहले डायबिटीज ट्रीटमेंट, इंसुलिन की जरूरत और फेफड़े की सेहत को ध्यान में रखा जाता है। इसका फैसला पूरी तरह से डॉक्टर की निगरानी में होती है।
इंसुलिन इंहेलर लेने पर शुरुआत मेंखांसी, गले में खरासया छाती में ड्राईनेस की समस्या महसूस हो सकती है। इसके डोज की बात करें, तो यह इंजेक्टेड इंसुलिन की तुलना में कम फ्लेक्सिकबल होती है। इसलिए इसे डॉक्टर की निगरानी में ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए।