दादा-दादी और बच्चे फोटो.सोशल मीडिया
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Grand Parents Day: बचपन की कहानियों से लेकर जिंदगी की सीख तक, अनमोल हैं जिंदगी में दादी-नानी के ये रिश्ते

Grandparents And Children: ग्रैंड पेरेंट्स डे के मौके पर जानिए क्यों दादा-दादी और नाना-नानी बच्चों के लिए सिर्फ प्यार का रिश्ता नहीं, बल्कि कहानियों, संस्कारों और जीवन की सीख देने वाली मजबूत कड़ी हैं।

रीता राय सागर

Grand Parents Day 2026: 21वीं सदी में बच्चों का बचपन मोबाइल स्क्रीन, ऑनलाइन क्लास और कार्टून के बीच बीत रहा है। ऐसे में घर के बुजुर्गों के साथ बिताया हुआ समय पहले से भी कहीं ज्यादा जरूरी हो गया है, क्योंकि दादा-दादी और नाना-नानी बच्चों को सिर्फ प्यार नहीं करते थे, वे उन्हें वैल्यूज और अपनी जड़ों से जुड़े रहना सीखाते हैं।

याद कीजिए अपना बचपन

गर्मियों की छुट्टियां शुरू होते ही नानी के घर जाने की खुशी। सोने से पहले दादी के पास बैठकर रात में कहानी सुनना। दादा के साथ शाम को टहलना। नानी के हाथ के खाने के लिए जिद करना। मां से छिपकर कोई शरारत करना और फिर मां की डांट से दादी का बचाना।

ये बातें आम थी, इसलिए तब इन छोटी-छोटी बातों की कीमत समझ नहीं आती थी। लेकिन बड़े होने के बाद एहसास होता है कि बचपन की सबसे खूबसूरत यादों में अक्सर घर के बुजुर्गों की खनक और उनका निस्वार्थ प्यार शामिल होता है।

दादी की कहानियां सिर्फ कहानियां नहीं होतीं

एक था राजा, एक थी रानी...से शुरू होने वाली कहानी बच्चों के लिए न केवल मनोरंजन होते थे, बल्कि बच्चे उन कहानियों में खो जाते थे। उन कहानियों में अच्छे-बुरे की समझ, सही-गलत का फर्क और मुश्किल समय में धैर्य रखने जैसी बातें तब बहुत सहज तरीके से सिखाई जाती थी। दादा-दादी जब अपने बचपन के किस्से सुनाते हैं, तो बच्चे सिर्फ एक कहानी नहीं सुन रहे होते। वे अपने परिवार और उस दुनिया को समझ रहे होते हैं, जो उन्होंने कभी देखी ही नहीं।

कई बार इन कहानियों में अपनी ही पीढ़ियों का इतिहास छुपा होता था। यही कहानियां बच्चों को बताती है कि उनकी कहानी आज से शुरू नहीं हुई है। उसके पीछे भी एक पूरा परिवार, एक इतिहास और कई पीढ़ियों की यादें है।

यहां बच्चों को 'परफेक्ट' होने की जरूरत नहीं होती

मां-पापा अक्सर बच्चे की पढ़ाई, होम वर्क, स्क्रीन टाइम और भविष्य को लेकर चिंतित रहते हैं। उनकी डांट में भी चिंता छिपी होती है। लेकिन दादा-दादी के पास अक्सर बच्चे के लिए थोड़ा ज्यादा समय होता है। बच्चा वही बात उनके सामने बिना डरे कह सकता है, जिसे शायद वह माता-पिता से कहने में झिझकता हो। बुजुर्गों में धैर्य होता है, इसी वजह से वे तुरंत सुधारने के बजाय पहले सुनते हैं। यही अपनापन बच्चे को भावनात्मक सुरक्षा देता है।

संस्कार भाषण से नहीं, रिश्तों से आते हैं

बच्चे को बड़ों की इज्जत करो, सच बोलो या मुश्किल में किसी का साथ दो कहना आसान है। लेकिन जब बच्चा अपने दादा को किसी जरूरतमंद की मदद करते देखता है, दादी को पुरानी चीज संभालकर रखते देखता है या नानी को घर आए मेहमान के लिए बिना शिकायत खाना बनाते देखता है, तो वह इन बातों को सिर्फ सुनता नहीं, प्रैक्टिकली करते हुए देखता है।

बच्चों को जड़ों से जोड़े रहना सीखाते हैं

आज का बच्चा शायद यह न जानता हो कि उसके दादा बचपन में कैसे स्कूल जाते थे, उसकी नानी की शादी के समय घर कैसा था या परिवार पहले किस शहर में रहता था, लेकिन जब ये बातें घर के बुजुर्ग सुनाते हैं, तो परिवार का इतिहास किताब से निकलकर बच्चे के सामने जीवंत हो जाता है। उन्हें पता चलता है कि उसके माता-पिता भी कभी बच्चे थे। उसके दादा-दादी भी कभी जवान थे।

समय बीत जाता है, लेकिन यादें नहीं

बचपन में हमें लगता है कि दादी हमेशा रहेंगी। नानी के घर हर छुट्टी में जाना होगा। दादा रोज शाम को दरवाजे पर मिलेंगे। वास्तव में ऐसा नहीं होता है। ये लोग फिर यादों में सिमट कर रह जाते हैं। फिर कभी पुराने घर की अलमारी से दादी की साड़ी की खुशबू आती है, किसी खाने का स्वाद नानी की याद दिलाता है या अचानक कोई पुरानी कहानी याद आ जाती है और तब समझ आता है कि बचपन में हमें जो सबसे कीमती चीज मिली थी, वह कोई खिलौना नहीं था। वह किसी का दिया हुआ वक्त था।

  • अगर घर में दादा-दादी या नाना-नानी हैं, तो बच्चों को उनके पास बैठने दीजिए।

  • उन्हें एक और कहानी सुनाने दीजिए।

  • उन्हें पुराने किस्सों पर हंसने दीजिए।

  • उन्हें वही सवाल बार-बार पूछने दीजिए।

  • आज की ये साधारण बातें, कल उनके बचपन की सबसे खूबसूरत याद बन जाएगी।  

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