Bindi In Hinduism: माथे के बीचों-बीच ललाट पर लगाई जाने वाली छोटी-सी बिंदी भारतीय महिलाओं के लुक का पुराना हिस्सा है। साड़ी या सलवार-सूट के साथ पारंपरिक अंदाज हो या रोजमर्रा का लुक, बिंदी हर रूप में अपनी अलग जगह बनाती है। बिंदी बुझे हुए चेहरे में भी एक चमक सी ला देती है। फैशन इंडस्ट्री और खूबसूरती के लिए लगाई जाने वाली बिंदी भारतीय परंपरा और अलग-अलग समुदायों की मान्यता रही है।
भौंहों के बीच स्थित माथे के स्थान को एकाग्रता और आध्यात्मिकता से जोड़ा जाता है। योग परंपरा में इस जगह का संबंध आज्ञा चक्र से बताया जाता है, जिसे तीसरी आंख के तौर पर देखा जाता है। अलग-अलग समुदायों में इसके अर्थ अलग रहे हैं और बिंदी लगाने वाला हर व्यक्ति इसे किसी आध्यात्मिक अनुभव के प्रतीक के तौर पर पहनता है।
लाल रंग की बिंदी भारतीय परंपरा में सबसे ज्यादा पहचानी जाती है। लाल रंग को शुभता, समृद्धि, प्रोडक्टिविटी और विवाह से जोड़ा गया है। इसी वजह से कई हिस्सों में लाल बिंदी का संबंध विवाहित हिंदू महिलाओं के श्रृंगार से माना जाता है।
पहले माथे पर निशान लगाने के लिए कुमकुम, सिंदूर और दूसरी पारंपरिक चीजों का इस्तेमाल किया जाता था। समय के साथ बिंदी लगाने का तरीका बदला और यह सजने-संवरने का हिस्सा बन गई। अब बाजार में अलग-अलग तरह की तैयार बिंदियां आने लगीं। चिपकने वाली स्टिकर बिंदी आने के बाद से इसे लगाना और इसका टिकाऊपन दोनों ही आसान हो गया।
बाजार में अलग-अलग रंग, आकार और डिजाइन की बिंदियां मिलती हैं। महिलाएं इन्हें साड़ी, सलवार-सूट, ज्वेलरी और यहां तक कि रोजमर्रा के आउटफिट के साथ भी मैच करती हैं। छोटी-सी बिंदी अब पूरे लुक को ट्रेडिशनल, एलिगेंट व स्टाइलिश फैशन क्रिएट करने का तरीका बन चुकी है।
आज बिंदी किसी विवाहित महिला, उम्र या खास पहनावे तक सीमित नहीं है, बल्कि बिंदी अब फैशन रनवे का भी हिस्सा है। कई महिलाएं इसे अपनी पसंद और व्यक्तिगत स्टाइल के हिसाब से लगाती हैं। बिंदी एक फैशन एलिमेंट की तरह चेहरे पर निखार लाती है। यही वजह है कि सदियों पुरानी यह छोटी-सी बिंदी आज भी भारतीय सौंदर्य और फैशन की पहचान बनी हुई है।